निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५ ) ४ अ० १ पा० १ खं० में 'इन्' ( अदा०प० ) धातु और लिट् के प्रथमका एक वचन है। और 'मध्या' की 'मध्ये' इत्यादि । शब्द समाधि कब और किस प्रकार देना चाहिये ? जिस मन्त्र का परोक्षवृत्ति शब्द हो, उस मन्त्र की अर्थ परिज्ञान के लिये देखना चाहिये । जब उसके अन्य शब्दों का अर्थ और संगति प्रतीत होजावै वहां किसी एक शब्द के सं- स्कार या प्रकृति प्रत्यय आदि की प्रतीति नहीं, तो उस काल में जितना अर्थ वाक्य में अपूर्ण और एक शब्दगम्य हो उसे उस गूढ शब्द का अर्थ मानना चाहिए। अर्थ निश्चय के अन- न्तर ही इस शब्द समाधि का उपयोग होता है, जिससे कि- शिष्य को लाभ है। एक काण्ड का विषय दूसरे काण्ड में । जिस प्रकार दो तलघ्याओं का जल एक नालीके द्वारा मिलता हों, उसी प्रकार प्रथम दो काण्डों का विषय आपसमें मिल जाता है। प्रथम काण्डमें एक एक अर्थ में अनेक अनेक शब्द दिखाये हैं और दूसरे में एक एक शब्द स्वतन्त्र २ अर्थों में संग्रह किये हैं, किन्तु दो या अधिक शब्द एक अर्थमें नहीं। यही उनका विषय भेद है। तो भी शब्द स्वभाव उन दोनों काण्डों के विषयको मिला देता है। अर्थात् जो ही शब्द पर- स्पर की अपेक्षा भिन्न अर्थों को कहते हैं, वेही किसी एक अर्थ को कहने लगते हैं। और जो एक अर्थको कहते हैं, वेही आवश्यकतावश से भिन्न २ अर्थों को कहने लगते हैं। इस प्रगति के अनुसार जो ही शब्द भिन्नार्थकता की दशामें नैगम ( ऐकपदिक ) काण्ड में आजाते हैं, वेही समानार्थकता के अधीन नैघण्टुक काण्डमें चले आते हैं। यही दोनों काण्डोंका विषय संकर ( मेल ) है।