भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 426

हिन्दी निरुक्त ( ६ ) ४ अ० १ पा० १ खं० शब्दों की एकार्थता और भिन्नार्थता। जो लुढकता है, वह ढलान की ओर चलता भी है। जो उछैलता है, वह नीचे से ऊपर को चलता भी है जो गिरता है, वह ऊपर से नीचे को चलता भी है। जो सरकता है, वह धीरे २ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर चलता भी है। इस प्रकार एक ही क्रिया दो रूपों में दिखाई देती है, इस कारण से जब कोई किसी एक विशेष क्रिया को किसी शब्द से कहेगा, तो वह शब्द अवश्यं दो क्रियाओं की भी बोधन करेगा। इसके लिये फिर 'लुढकता है' आदि उक्त क्रियाओं पर ध्यान दी- जिये, जिनके प्रयोग से 'लुढकना' और 'चलना' दोनों क्रियायें प्रतीत होती हैं। प्रयोजन? जब इनका चलन अर्थ ही लेते हैं, तो ये अनेक शब्द एक अर्थ के वाचक होकर नैघण्टुक काण्डमें आजाते हैं, और जब विशेष २ अर्थों को कहने लगते हैं, तो भिन्नार्थक होकर नैगम काण्ड में चले आते हैं। इसी रहस्य के अनुसार भिन्नार्थकता के कारण नैगम काण्ड के विषय होने पर भी 'कसति' 'लोठते' 'श्च्योतते' इत्यादि बहुत से धातु ( निघ० अ० २ खं० १४ ) में गमनार्थक एक सौ बाईस ( १२२ ) धातुओं के मध्य में पढे गए हैं, जिससे उनका सामान्य रूपसे गमन-यह एक ही अर्थ होता है, तो भी प्रसिद्धि के अनुरोधसे पृथक् २ द्रव्यों की क्रिया के वाचक ही समझने चाहियें। जैसे- जो पुरुष कमर को ऊंची करके चलता है, वही 'कसति'-ऐसे कहा जाता है किन्तु अन्य नहीं,-जो खड़ा २ चलता है। जो ही कोई अचेतन लोहा आदि वा अन्य चेतन पुरुष आदि इच्छा के बिना ढलान में लुढकता है, वही 'लोटते' ऐसे कहा जाता है, किन्तु अन्य नहीं और ऐसे ही जब कोई द्रव द्रव्य या पिघली हुई वस्तु झरती है, तब वही 'श्च्योतते' ऐसे कही