निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७ ) ४ अ० १ पा० १ खं० जाती है, किन्तु अन्य नहीं। इस प्रकार गमन अर्थ वाले धा- तुओं की एकार्थता होने पर भी प्रसिद्ध अर्थ में सामर्थ्य रखने के कारण उन धातुओं का गमन विशेषों में योग्यतानुसार नि- वेश जानना चाहिये, तथा ऐकपदिक भी समझना चाहिये। ध्यान रहे कि-एक स्थान से दूसरे स्थान में प्राप्ति जो चलन से होती है, वह सब गतियों का एकसा कार्य है, इसी से उन सबकी एकार्थता कही है। क्यों कि-‘सामान्य अर्थ के वाचक शब्द कहीं विशेष अर्थ के वाचक होजाते हैं, और वि- शेष अर्थ के वाचक कहीं सामान्य अर्थ के वाचक। नैगम काण्ड की व्याख्या का स्वरूप। “तत्वं पर्यायशब्देन व्युत्पत्तिश्च द्वयोरपि निगमो निर्णयश्चेति व्याख्येयं नैगमंपदे” अर्थात् पर्याय शब्द से तत्व (अर्थ) करना। मूलशब्द और उसके पर्याय दोनों की व्युत्पत्ति करना। निगम देना। और उसका निर्णय करना। इसके अतिरिक्त ‘दयति’ ‘अकूपार’ आदि पदों को स्थान बना कर उनके उपदया, दान, हिंसा आदि अनेक अर्थों को बताना, तथा इन उपदया, दान, हिंसा आदि अनेक अर्थों का एक शब्द से वाच्य सिद्ध करना ऐसी व्याख्या भी इस काण्ड में होगी। दो व्याख्याएं। इस कांड में संक्षेप से दो व्याख्यायें हैं। एक-नहीं प्रतीत होते हुये अर्थ को पर्याय शब्द देकर विभाग पूर्वक प्रतिपादन करना। और दूसरी शब्दकी व्युत्पत्ति करना। पहिली व्याख्या, का प्रयोजन अर्थ का परिज्ञान है, और दूसरी का शब्द-परि- ज्ञान। यह दोनों प्रकार की व्याख्या इस नैगम काण्ड में यथासंभव दी जावेगी।