निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ८ ) ४ अ० १ पा० १ खं० ऐकपदिक नाम का प्रयोजन । पहिले काण्ड में एक एक अर्थ के वाचक पद समूह के समूह पढे गए हैं, और इस प्रकरण में एक एक अर्थ का ज्ञापक एक एक ही पद रखा गया है, जैसे-'जहा' 'निधा' इत्यादि, इसी से इस काण्ड का नाम 'ऐकपदिक' (एक एक पद से रचित) पूर्वाचार्य्यं ने धरा है। मन्त्रों में पदों का अध्याहार । भाष्यकार यास्क मुनि मन्त्रों की व्याख्या में पदों को अध्याहार करते ( ऊपर से लेते) हैं । जैसे-(नि० अ० ४ पा० १ खं० २) “कोनुमर्य्या” मन्त्रमें “को अस्मदीषते” की व्याख्या में “कः अस्मद् भीतः पलायते' यहां 'भीतः' पद का अध्याहार किया है । एवम् (नि० अ० ४ पा० १ खं० ६-) “संमातपन्ति” मन्त्र में “शिरश्ना व्यदन्ति” वाक्यमें 'सूत्राणि' पद, (नि० अ० ४ पा० १ खं० ८-) “मरुत्वां इन्द्र” मन्त्र में “वृषभः” की व्याख्या में 'अपाम्' पद, और “मदाय” की व्याख्या में 'जैत्राय' पद, (नि० अ० ४ पा० २ खं० ४-) “इन्द्रेण संहिदृक्षसे” मन्त्र में “अभिभ्युषा” की व्याख्या में 'गणेन' पद, (नि० अ० ४ पा० ३ खं०५) “अथानः शंयोः” मन्त्र में “शंयोः” पदकी व्याख्या में 'रोगाणाम्' 'भयानाम्' ये दो पद अध्याहार किये हैं । इस से यह सिद्ध हुआ कि-मन्त्र में अर्थ के अविरोधि पद अध्याहार करने चाहिएं । यह आवश्यक भी है । क्यों कि-मन्त्रोंमें प्रायः अधूरे वाक्य बहुत हैं, यदि उन में ऐसा नहीं किया जायगा, तो उनकी अर्थवत्ता ही न रहेगी ॥ समाम्नाय और निरुक्त का एक कर्त्ता (प्रश्नः) “विद्याम तस्य” (नि० अ०४ पा०३ खं०२) इस मन्त्र