निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४ ) ४ अ० १ पा० १ खं० संस्कार की विचारणा नहीं है और उनकी स्वतन्त्र व्याख्या भी प्रथमाध्याय के द्वितीय पाद में होचुकी है, तथापि इस प्रकरण में अनेकार्थ शब्द व्याख्येय हैं, उनकी समानता से यहां पर दिखा दिये गए हैं । ( १ ) मेहना, ( २ ) एरिरे, ये दो शब्द विभागानवत हैं । ( १ ) जरते, ( २ ) धयसे ( ३ ) वियुते ये तीन शब्द अर्थानवगत हैं । ( १ ) अस्याः ( २ ) अस्य, ये दो शब्द स्वरानवगत हैं । ( १ ) गौः, ( २ ) गातुः, इन दो पदों की व्याख्या पहिले आचुकी । ( १ ) नसन्त, ( २ ) परितक्म्या ( ३ ) शिप्रे इन तीन पदों की व्याख्या आगे होगी, और शेष इकतालीस (४१) शब्द सब अनवगत संस्कार हैं । अध्यायके अन्तमें मूल (समाम्नाय) शब्दों और प्रासंगिक शब्दों की सूचिएं भी दी जावेंगी, जिनसे इन शब्दों के अर्थ और निगम भी जाने जा सकेंगे ॥ शब्द समाधि । शब्द समाधि उसे कहते हैं, जिस में उसके प्रकृति (धातु) प्रत्यय ( विभक्ति और वचन आदि ) स्पष्ट प्रतीत होते हों, और वह किसी ऐसे शब्दके अक्षरों व अर्थ से समानता रखता हो, जिसके प्रकृति और प्रत्यय आदि स्पष्ट प्रतीत न होते हों अर्थात् परोक्षवृत्ति या अतिपरोक्षवृत्ति शब्द । प्रयोजन यह है कि-इस प्रकरणमें जितने मूल शब्द हैं, वे आपस में कोई किसी से पर्यायता नहीं रखते, इस लिये उनकी व्याख्या में शब्द समाधि ही एक उत्तम उपाय है, जिसके द्वारा सहजमें निश्चय हो जाता है, कि-इस शब्द की सृष्टि इसी प्रकार है, और इसका यह अर्थ होना उचित है । जैसे-'जहा' की शब्द समाधि 'जघान' है । जिसके द्वारा प्रतीत होता है कि-'जहा'