निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( २ ) ४ अ० १ पा० १ खं० अनेक नाम हैं । एवम् अमरकोश के नानार्थ वर्ग में 'नाक' 'लोक' आदि शब्दोंके जिस प्रकार आकाश, स्वर्ग 'लोक' 'भुवन' आदि अनेक अनेक अर्थ बताये हैं, उसी प्रकार इस नैगम काण्ड में एक एक शब्द के अनेक अनेक अर्थ बताए गए हैं, तथा ऐसे शब्द, जिनके संस्कार आदि की प्रतीति नहीं होती, उनके संस्कार आदि का अवगम भी कराया गया है । सुतराम् इस काण्ड में अनवगत और अनेकार्थ शब्द व्याख्येय हैं । अवगत नाम जाने हुए और अनवगत नाम नहीं जाने हुए का है । किन्तु इस प्रकरण में अनवगत शब्द से वे शब्द लिये गए हैं, जिनके प्रकृति, (धातु) प्रत्यय, जाति आदि शब्द-धर्मों का अव- गामात्र से परिज्ञान नहीं होता । भगवद्दुर्गाचार्य ने इन अन- वगत शब्दोंके भेदोंकी एक सूची भी 'शिताम' शब्दकी टीकामें दी है । जिस शब्द में जिस धर्म की प्रतीति नहीं होती, वह उस धर्म से अनवगत कहा जाता है । जैसे-संस्कार (प्रकृति प्रत्यय आदि) की प्रतीति नहीं, तो संस्कारानवगत और जाति की प्रतीति नहीं, तो जात्यनवगत इत्यादि । अनवगत भेदों की उदाहरण सहित सूची । अनवगत भेद । उदाहरण । व्याख्या (१) पदजात्यनवगत । "स्व" नाम, या निपात? (२) अभिधेयानवगत । "शिताम" बाहु, यो यकृत् आदि ? (३) स्वरानवगत । "वनेनवायो" 'वने' 'न' का स्वर या 'वनेन' का ? (४) संस्कारानवगत । "ईशान्तासः" क्या धातु, और क्या प्रत्यय? (५) गुणानवगत । "करूलती" किसका गुण (विशेषण) ? (६) विभागानवगत । "मेहना" "मेहना" या "मे-इह-ना" ( नास्ति ) !