निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( १२ ) ४ अ० १ पा० १ ख०
| निघण्टु-स्थ सं० | अनेकार्थ | तत्व (अर्थ) अवगम | निगमः |
|---|---|---|---|
| व्याख्यात | |||
| ५४ | गौः | व्याख्यातः [नि०अ०२पा०२ख० १] (पा०४ख०३) | “अत्राहगोरमन्वत” |
| ५५ | गातुः | व्याख्यातः । (पा०४ख०४) | |
| व्याख्यास्यमान | |||
| ११ | शिप्रि | हनूनासिके । (पा०२ख०२) | |
| २२ | नसन्त | द्वादशाध्याये । (पा०२ख०७) | |
| २७ | परितक्म्या | षोडशाध्याये । (पा०ःख०८) | |
| अर्थसंस्कारोभयानवगत और अनैकार्थ | |||
| ३ | शिताम | दोः (बाहुः) । योनिः, शाकपूणेः। श्यामः, तटीकेः श्वेतमांसं, गालवस्य । |