भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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हिन्दी निरुक्त ( १६ ) ४ अ० १ पा० १ सं०

निघण्टु-स्थ सं० | अनेकार्थ | तत्त्व (अर्थ) अवगम | निगमः

३७ | अप्रमायुवः | अप्रमाद्यन्तः । ( पा० ३ खं० ३ ) | "असत्रमायुवो रक्षितारो दिवे दिवे" ३८ | च्यवनः | च्यावनः । ( ऋषिः ) | "युवं च्यवानं सनयं यथा रथम्" | | ( पा० ३ खं० ३ ) | ४१ | जहुरे | जहिरे । ( अनेकार्थधातुप्रकृ- | "जहुरे विचिंतयन्तः" | | तिः ) ( पा० ३ खं० ३ ) | ४३ | क्राणाः | कुर्वाणाः । ( पा० ३ खं० ३ ) | "गीर्भिः क्राणा अनूषत" । ४४ | वाशी | वाक् ( पदे अनेकार्थम् । ) | "वाशीभि स्ततक्षाश्मन्मयीभिः" । | | ( पा० ३ खं० ३ ) | ४५ | विषूच्यस्य | विष्वञ्चस्य । ( पा० ३ ख० ३) | "सशूद् दूर्यो विषूच्यस्य जन्तोः" । ४७ | पिता | माता (पातवा) पालयितावा | "द्यौर्मे पिता" । | | जनयितावा । ( पा० ३ ख. ५ ) | ४८ | शंयोः | ( सुखंयोः ) ( पञ्चम्यन्तं वा ष- | "शशानः शंयोररपो दधात" । | | ष्ठ्यन्तं वा) शमनं च रोगाणां | | | यावनं च भयानाम् । | | | अथापिबार्हस्पत्य : । | "तच्छंयोरावृणीमहे"