भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 1282 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 454

हिन्दी निरुक्त ( ३५ ) ४ अ० १ पा० ५ ख०


(भा०) 'अतिथिः' अभ्यातितो गृहान् भवति । अभ्येति तिथिषु परकुलानि-इति वा । गृहाणि- इति वा । (अयमपि इतरः अतिथिः एतस्मादेव) 'दुरोण' इति गृहनाम । दुरवा भवन्ति, दुस्तर्पाः । [२यपा०] “ इमं नो यज्ञ मुपयाहि विद्वान् ” [३यपा०] सर्वा अग्ने अभियुजो विहत्य [४र्थपा०] शत्रूयताम्आभर भोजनानि । [ व्याख्यान्तरम् ] विहत्य अन्येषां बलानि, शत्रूणां भवनात् आहर भोजनानि-इति वा । धनानि-इतिवा । 'मूषः' (६) मूषिका इत्यर्थः । 'मूषिकाः' पुनः मुष्णातेः । 'मूषो' ऽपि एतस्मादेव ॥५॥

अनुवादः ।

मन्त्रार्थः- हे भगवन्! अग्नि देव! 'जुष्टः' हमसे स्तुतियों द्वारा सेवा किया हुआ, 'दमूनाः' कठोर मन न हुआ हुआ, या 'यह मेरा घर है' ऐसा मानता हुआ अथवा 'इन्हें देनाही चाहिये'-ऐसा मन करता हुआ, अथवा 'दमन शीलों में तेरा मन है, और वैसे है,-यह जानता हुआ, 'अतिथि' सांझ सवेरे अग्निहोत्रियों के अतिथि (सद्यमान' 'विद्वान्' हमारी भक्ति को जानने वाला 'नः' हमारे 'दुरोणे' घर में 'इमम्' इस 'यज्ञम्' यज्ञ को 'उपयाहि' आ । [और-] हे अग्ने ! अग्नि देव ! 'विश्वा' सब 'अभियुजः' सामना करने वालों को 'विहत्य'