भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 453, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 453

हिन्दी निरुक्त (३४) ४ अ० १ पा० ५ खं० जो कि उसके घर में नहीं हैं, चाहे कोई विलक्षण वस्तु हो, या अपने घर में विद्यमान वस्तु की सदृशीय वस्तु । किन्तु इन दोनों प्रकार की प्रार्थनीय वस्तुओं में एक ही के मांगने में कोई प्रमाण नहीं है, इस लिये 'संहगा' या 'प्रार्थनीय', इस अर्थ की बुद्धि से शाकल्य 'मेहना' को एक पद मानता है । अर्थात् इन के मत में ऐसी व्याख्या से उक्त दोनों प्रकार की वस्तु मांगी जा सकती है । दूसरे गार्ग्य आचार्य के मत में 'मेहना' पद से वही वस्तु मांगी गई है, जो 'मेइह नास्ति' (मेरे इस घर में नहीं है) इस वाक्य से आती है, इस लिये यहां तीन पद ही होने चाहिएं । “यदिन्द्र” मन्त्र के “मेहना” पद में किसी एक पक्ष को पुष्ट करने वाला कोई लिङ्ग या प्रमाण नहीं, इसी से ऐसी विप्रतिपत्ति (विरुद्ध उक्ति) हुई है । ऐसेही शाखा भेद से पदों के विकल्पों में अर्थ के अविरोध से व्याख्या करनी होगी ॥२॥ (५ खं०) १ [निरु०] “जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इमन्नो यज्ञमुपयाहिविद्वान् । विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्या शत्रूयता माभरा भोजनानि ॥” [ ऋ० सं० ३, ८, १८, ४ ] १ 'जुष्टो दमूनाः' इति वसुश्रुतस्य आत्रेयस्य इयमार्षम् । त्रिष्टुप्छन्दः । आग्नेयी । प्रातरनुवाकाश्विनयोःशस्यते । स्विष्ट- कृतपुरोनुवाक्येयं चातुर्मास्येषुसाकमेधे ।

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