निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ३३ ) ४ अ० १ पा० ४ख० प्रकार बीच में तीन पद हैं । (सन्धिसे ‘मेहना’ एक पद जैसा होगया है ।) हे अद्रिवन् ! वज्रके धारण करने वाले ! तुमसे हमारे लिये वह (धन) देने योग्य है । 'अद्रि' क्यों ? इस से आदरता या विदारण करता है। अथवा भक्षणार्थक ‘अद्’ (अदा० प०) धातु से है। क्योंकि “ते सोमादः” (वे सोम के भक्षण करने वाले ) [“हरी इन्द्रस्य निंसते”] [ऋ० सं० ८, ४, ३०, ४] इस मन्त्र को विचारते हुए ऐसा ही जान पड़ता है । ‘राधस्’ यह धन का नाम है। क्यों कि-इससे सब कार्यों को राधन (साधन) करते हैं। “तत्” सो “नः” हमारे लिये ‘त्वम्’ तू ‘वित्तधन’ हे प्राप्तधन ! ‘उभाभ्याम्’ दोनों ‘हस्ताभ्याम्’ हाथों से “आहर” लेआ। ‘उभ’ क्यों ? सम्पूर्णा (पूरे) होते हैं ॥ (दमूनाः (५) । 'दमूना' क्यों ? दममनाः या मनको दमन करनेवाला (दबाने वाला) है। अथवा दान में मन वाला है । अथवा दान्त (दबे हुवे) मन वाला है। अथवा ‘दम’ यह घरका नाम है। उसमें मन रखता है । ‘मनः’ क्यों ? ‘मन’ (तनो०आ०) धातु से है। (इससे मनन किया जाता है ।) ॥ ४ ॥ 'मेहना' (४) पद में पद-विकल्प है । बह्वृच (ऋग्वेदी) 'मेहना' इतना एक पद मानते हैं, और छन्दोग (सामवेदी) इस में 'मे-इह-न' ऐसे तीन पद मानते हैं। इन दोनों ही मतों पर ध्यान देते हुए भाष्यकार ने शाकल्य और गार्ग्य दोनों, आचार्यों के अभिप्राय यहां पर दिखाए हैं। प्रयोजन, ऐसे ऐसे निर्वचन और दोनों आचार्यों के प्रामाण्य का दिखाना है । पदकारों का पद विकल्प में अभिप्राय । विद्यावान् या धनवान् किसी उत्तम वस्तु को मांगता है, ५