भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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राधस्तन्नो विदद्वस उभया हस्त्याभर ॥” [ऋ०सं० ४, २, १०, ३९] (भा०) [चित्रं] चायनीयं मंहनीयं धनमस्ति, 'यत् मे इहनास्ति'-इतिवा । त्रीणि मध्यमानि पदा- नि । त्वया नस्तद् दातव्यम् अद्रिवव् ! । 'अद्रिः' आहणाति एतेन । अपिवा अत्तेःस्यात् । 'ते सो- मादः' इति हविर्जायते । 'राधः' इति धन नाम । राध्नुवन्ति एनेन । तत् नः त्वं वित्तधन! उभाभ्यां हस्ताभ्याम् आहर । 'उभौ' समुब्धौ भवतः ॥ दमूनाः (५) दममनावा । दानमनावा । दान्त- मनावा । अपिवा 'दम' इति गृहनाम । तन्मनाः स्यात् । 'ममो' मनोतेः ॥ ४ ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-हे इन्द्र ! 'यत्' जो 'चित्रम्' पूजनीय 'मेहना' मँहगा अथवा 'यत् मेहह्न' मुझे यहां अप्राप्त 'त्वादात्म' हमारे लिये तुझसे देने योग्य 'राधः' तेरा धन 'अस्ति' है, 'तत्' वह 'नः' हमारे लिये हे 'अद्रिवः' वज्रके धारण करने वाले! हेविद्- द्वसो ! धन को प्राप्त किए हुए ! 'उभया' दोनों 'हस्ति'हाथों से 'आभर' ले आओ ॥ निरुक्तार्थ- "चित्र" 'चायनीय, पूजनीय या 'मंहनीय' ( मंहगा ) धन है । ( शाकल्यमत ) अथवा 'जो मेरे यहां नहीं है'-यह ( गार्ग्यमत ।) 'यत्' 'मे' 'इह' 'न,' 'अस्ति' इस

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