भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 457

हिन्दी निरुक्त ( ३८ ) ४ अ० १ पा० ७ खं०

कंकरिए' 'अभितः' चारों ओर से 'सं-तपन्ति' पीड़ा करती हैं ।
'मूषः' मूसै 'न' जैसे 'शिश्ना' अन्न आदि से लिप्त सूत्रों को
चाबते हैं । अथवा अङ्ग का नाम हो सकता है। पूंछों को
'व्यदन्ति' घृत तैल के पात्रों में डुबों कर चाटते या चबाते
हैं। हे देव ! 'ते' तेरे 'स्तोतारम्' स्तुति करने वाले मुझको
'आधयः' मनकी कामनाएं 'या व्यथाएं पीड़ा करती हैं। हे 'रो-
दसी' द्यावापृथिवीओ ! 'मे' मुझ 'अस्य' इस जन के दुःखको
'वित्तम्' तुम दोनों जानते हो ॥
कूप में गिरे हुए त्रित ऋषि को यह सूक्त प्रतीत हुआ ।
इस विषय में इतिहास से मिला हुआ, ऋचाओं से मिला
हुआ, और गाथा या कथा से मिला हुआ ब्रह्म या वेद है ।
'त्रित' क्यों? मेधा (बुद्धि) से तीर्णतम (बहुत तैरा हुआ) था ।
अथवा संख्या से ही नाम माना हुआ हो सकता है । [जैसे-]
एकत, द्वित, और त्रित ये तीन ऋषि हुए थे ॥६॥
व्याख्या
इतिहासमिश्रम् । इस से भाष्यकार ने यह दिखाया कि
यह भी एक सूक्तों का स्वभाव है, उन में इतिहास जैसा भी
होता है । अतः-उन में प्रकरण से भी संदेह युक्त पद का अर्थ
निश्चय कर लेना, जैसे कि-भाष्यकार ने 'पर्शु' शब्द को
समझा ॥ ६ ॥
१ ( ख० ७ )
[निरु०-] “इषिरेण ते मनसा सुतस्य भक्षीमहि
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१-“इषिरेण ते मनसा” इति प्रगाथस्य द्वयमार्षम्
त्रिष्टप छन्दः । सौमी । ७ ॥