निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४२ ) ४ अ० २ पा० १ ख० ( दिवा० प० ) धातु से है । यह भी मधु (शहद या मद्य ) इसी धातु से है । हे इन्द्र ! 'प्रदिवः' पहिले दिनों में 'सुता- नाम्' बनाए हुये सोम रसों का भी 'त्वम्' तू 'राजा' 'असि' है ॥ ८ ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ४,१ ॥ चतुर्थेऽध्याये द्वितीयः पादः ( ख० १ ) [निरु०] तितउ (१०) परिपवनं भवति । ततवद्वा । तुन्नवद्वा । तिलमात्रतुन्नमिति वा ॥ १ ( ९ ) ॥ अनुवादः । [निरुक्तार्थः-] 'तितउ' (१०) परिपवन अर्थात् जिससे सत्त छाने जावें ऐसी चालनी का नाम है । 'तितउ' क्यों ? तत (चर्म) से मँढा हुआ होता है । अथवा तुन्नों (छिद्रों) वाला होता है । अथवा उसमें तिलके बराबर तुन्न ( छिद्र ) होते हैं ॥ १ ( ९ ) ॥ १ ( खं०२) [निरु०-] “सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसावाचमक्रत अत्रासखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ॥ ” [ ऋ० सं० ८, २, २३, २ ] १-“सक्तुमिव तितउना” इति विद्यासूक्तं बृहस्पतेरार्षम् ।