निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४४ ) ४ अ० २ पा० २ खं० न्याय युक्त करते हैं, । 'अत्र' वहां 'सखायः' समान ज्ञान वाले 'सख्यानि' समान शास्त्रों में परिश्रम किये हुओं के विज्ञानाँ को 'जानते' जानते हैं । [किन्तु दूसरा नहीं ।] क्योंकि-'एषाम्' इनकी 'अधि-वाचि' वाणी के ऊपर 'भद्रा' सुखदायक 'लक्ष्मीः' लक्ष्मी 'निहिता' स्थापित है ॥ [निरुक्तार्थ-] सक्तूके समान परिपवन (चालनी) से पवित्र करते हुए । 'सक्तु' , लगना अर्थ में 'सञ्च' ( भ्वा०प०) धातु से है क्योंकि-वह दुर्धाव या कठिनाई से धोया जाने वाला होता है । अथवा उलटे हुए 'कस' (भ्वा०प०) धातु से हो-सकता है। क्योंकि ! वह विकसित या फूला हुआ होता है। यहां धीर पुरुष मन से बाणी को न्याययुक्त करते हैं। अथवा 'धीर' धी या प्रज्ञावाले, वा धी या ध्यान-वाले पुरुष 'वाच्' नाम प्रज्ञान ( प्रकृष्ट ज्ञान ) को करते हैं। तहां 'सखा' समान विद्यावाले सख्य समानविद्यावालों की विद्याकी उन्नति को अच्छी तरह जानते हैं । इनकी बाणीके ऊपर भद्र (वाञ्छनीय) लक्ष्मी स्थापित है । 'भद्र' 'भग' शब्दसे व्याख्यान किया गया । ( दोनों शब्दोंकी समान व्याख्या है । ) 'भग' क्यों ? प्राणियों का भजने योग्य है, या प्राणी उसे भजते हैं । अथवा उसकी ओर भागते हैं । अथवा 'भवत्' (होता हुआ) रमण (रति) देता है । ( क्योंकि- जिसके वह होता है, वह रमता है ) अथवा सुकृती जन उस के भाजन होते हैं, इस से भग है । 'लक्ष्मी' क्यों ! लाभ से । ( क्योंकि-उसे लक्ष्मीवाले ही लभते या प्राप्त होते हैं । अथवा लक्षण से । ( क्योंकि- लक्ष्मी- वान् पुरुष लक्षित ( चिन्हित ) जैसा हो जाता है । ) अथवा