निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 465, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४६ ) ४ अ० २ पा० ३ खं० अनुवादः । मन्त्रार्थः—मैं 'सूर्यस्य' भगवान् सूर्य के 'तत्' उस 'देवत्वम्' देवताभाव को 'तत्' उस 'महित्वम्' महिमा को जानता हूँ कि-उसने 'कर्त्तोः' कुल कर्मकर्त्ताओं के 'मध्या' मध्य में या साझने 'विततम्' यह प्रकाश जाल फैलाया । और भी बड़ी भारी महिमा यह है कि 'संजभार' जो प्रकाश समूह औरों से बहुत काल में भी हटाया जाना कठिन है, उसे बिना ही परिश्रम के एक ही क्षण में सायंकाल के समय स्वयम् सूर्य देव हटा देते हैं । यदा-इत् जिसी समय सूर्य भगवान् अस्त होते हुये 'हरितः' रस (जल) के हरने वाले किरणों को 'सध- स्थात्' पृथिवी लोक से खैंच कर 'अयुक्त' अपने में रख लेते हैं 'आत्' उसी समय 'रात्री' 'वासः' सब लोक से दिन को खैंच कर 'सिमस्मै' सब लोक के लिये 'तनुते' अन्धकार को फैला देती है । अर्थात् यह सूर्य देव की ही महिमा है, कि उस के निकट होने से अँधेरा नष्ट होता है, और उस से त्यागे हुए देश में अन्धकार छा जाता है ॥ निरुक्तार्थ—सूर्य का वह देव भाव और वह महिमा है, जो किये जाते हुए कर्मों के स्थल में फैला, हुआ (प्रकाश) संहार किया जाता है । जब उस ने (वह) हरणों या आदित्य की रश्मियों को जोड़ा (जोड़ता है) । अथवा हरितों नाम अश्वों को । उसी समय सब के लिये रात्री दिन को (हटाकर) (अँधेरे को) फैलाती है । 'वेसर' नाम दिन को सब से हटा कर अपने में मिलाती हुई । अथवा उपमा अर्थ में हो-'जैसे रात्री दिन को (हटा कर) (अँधेरे को) फैलाती है' यह