निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ४७ ) ४ अ० २ पा० ४खं० वैसा भी निगम (बोधक मन्त्र) है ।—"पुनः समव्यत्००" [ ऋ० सं० ३, ८, २, ४, ] अर्थात् जैसे कोई स्त्री वस्त्र को बिनती हुई अस्त काल में फैलाए हुए तन्तुओं को फिर समे- टती है, और फिर उदय काल में फैलाती है, ऐसे यह रात्रि उदय काल में तम को समेटती है, और अस्तकाल में फिर उसे फैला देती है ! ( भा० ) 'समानात्सीत्' लपेट लेती थी या लपेट लेती है ॥ ३ ( ११ ) ॥ ( खं ४ ) १ [निरु-०] " इन्द्रेण संहिदृक्षसे सञ्जग्मानो अबिभ्युषा । मन्दूसमानवर्चसा ॥" [ ] (भा-०) इन्द्रेणाहि सन्दृश्यसे, सङ्गच्छमानः- अबिभ्युषा गणेन । मन्दू मदिष्णू युवांस्थः । अपि वा 'मन्दुना तेन-' इति स्यात्, 'समानवर्चसा'- इत्येतेन व्याख्यातम् ॥ ४(१२) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थ- निरुक्तार्थ- हे भगवन् ! इन्द्र ! तू 'अबिभ्युषा' भय रहित 'इन्द्रेण' ईश्वर के अथवा प्रदीप्त मरुद्-गण के साथ 'सञ्जग्मानः' नित्य ही मिलता हुआ 'संदृक्षसे' दिखाई देता है १ "इन्द्रेण संहि दृक्षसे" इति मधुच्छन्दसः इदमार्र्षम् । महाव्रते मरुदुक्थे तृचाशीतिषु शस्यते । सात्रिकेषु च अहःसु स्तो- मातिवृद्धौ प्रातःसवने ब्राह्मणाच्छंसि शस्त्रे इन्द्र उच्यते ।