निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५० ) ४ अ० २ पा० ५ खं०
रुंगिक-] यह भी दूसरा [मनुष्यों का] 'शिर' इसी व्याख्यान से है। क्यों कि ? इसके सब इन्द्रियें आश्रित हैं। 'संशूरणासः' भगवान् आदित्य से मिले हुए हैं। 'शूर' शब्द गत्यर्थक 'शु' (भ्वा० प०) धातु से है। [ क्यों कि ? वह शत्रुओं के साम्हने चला ही जाता है, लौटता नहीं ।] 'दिव्यासः' द्युलोक में पैदा हुए हैं । 'अत्याः' निरन्तर चलते ही रहते हैं, किन्तु क्षणमात्र भी कभी नहीं ठहरते । 'हंसाः इव श्रेणिशो यतन्ते' हंसों के समान श्रेणि (पङ्क्ति) बांध कर चलते हैं । 'हंस' क्यों? वे मार्ग को हनन (गमन) करते हैं । 'श्रेणि' 'श्रिञ् सेवायाम्' (भ्वा० उ०) धातु से है । 'यत्' जब वे 'अश्वाः' घोड़े 'दिव्यम्' स्वर्ग के 'अज्मम्' मार्ग को 'आक्षिषुः' (उदय से अस्त पर्यन्त) प्राप्त होते हैं ॥ 'अश्वाः' पद के साथ तुल्य विभक्ति होने से 'ईर्म्मान्तास.' इत्यादि पद अश्व के विशेषण है, "आत्माएव एषा रथो भवति आत्मा अश्व.” अर्थात् 'आत्मा ही इनका रथ होता है, और आत्मा ही अश्व'-इस युक्ति से सूर्यदेवता का ही यह मन्त्र हो सकता है या होना चाहिये, किन्तु अश्व की स्तुति में विनियुक्त हुआ है, यह ठीक नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये भाष्यकार समाधान करते हैं— 'आदित्य की स्तुति अश्व की होती है, क्यों कि-अश्व आदित्य से गढ़ा गया है, या उत्पन्न हुआ है। "सूरादश्वं वस- वो निरतष्ट" [ ऋ० सं० २, ३, ११, २ ] अर्थात्-वसुओं ने अश्व (घोड़े) को सूर्य से गढ़ कर निकाला है यह निगम भी है ॥ ५ (१३) ॥