निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त \qquad ( ४६ ) \qquad ४ अ० २ पा० ५ खं० अत्याः) 'शूरः' शवतेर्गतिकर्मणः । 'दिव्याः' दिवि- जाः । 'अत्याः' अतनाः । "हंसाइव श्रेणिशो य- तन्ते ।” 'हंसाः' हन्तेः। घ्नन्ति-अध्वानम्। (श्रेणि- शः इति) 'श्रेणिः' श्रयतेः । समाश्रिता भवन्ति । “यदाक्षिषुः” यदापन् । “दिव्यम्-अज्मम्” अजनि- म्, आ।जिम्-अश्वाः। अस्ति-आदित्यस्तुतिः-अश्व- स्य । “आदित्यादश्वो निस्तष्ट” इति । “सूरादश्वं वसवो निरतष्ट” [ऋ० सं० २, ३, ११, २] इत्यपि निगमो भवति ॥ ५ (१३) ॥ अनुवादः । मन्त्रार्थः-निरुक्तार्थः-सूर्य के रथ में जुते हुए घोड़ों की स्तुति है ।-सात (७) घोड़ों में से चार (४) घोड़े 'हेमन्तासः' विरल या आपस में अन्तर दिये हुए हैं । अथवा पृथ्वन्त ( चौड़ी छाती वाले ) या मोटी जांघ वाले हैं । उन सातों में से जो बीच के तीन घोड़े हैं, वे 'सिलिकमध्यमासः' एक से एक सटे हुए हैं । अथवा सातों घोड़े जघन और छाती में मोटे या चौड़े, तथा पेट में पतले या बिलकुल बिना पेट के हैं । [ऐसे भी स्तुति हो जाती है ।] अथवा शीर्षमध्यस हैं, या उन सातों के बीचका घोड़ा शिरोमणि है । अथवा 'सिलिक' नाम शिर और वह आदित्य है, क्यों कि- सब भूत (प्राणी) उसी पर टिके हुए हैं, और वो ही इनके मध्य में स्थित है । [प्रा- ७