भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 471

हिन्दी निरुक्त ( ५२ ) ४ अ० २ पा० ६ खं० 'इह' यहां काष्ठों में अरणि से अग्नि के रूपमें और जलमें बिजली के रूपमें 'अभवः'। उत्पन्न हो जाता है ॥ निरुक्तार्थः- 'कायमान' (१५) देखता हुआ । अथवा इच्छा करता हुआ । जब तू बन या काष्ठरूप और जलरूप माताओं में शान्त होता हुआ लय हो जाता है। हे अग्नि देव ! वह तेरा मार्ग लुप्त नहीं होता । क्योंकि-तू दूर (नष्ट) होता हुआ भी फिर यहां (काष्ठ (अरणि) अथवा जल (मेघ) में) वह्नि या बिजली के रूप में उत्पन्न हो जाता है ॥ (१६) “लोधं नयन्ति पशु मन्यमानाः”(ऋ०सं० ३, ३, २३, ३) अर्थात् लोभी को पशु के समान मानते हुए लेजाते हैं। “शीरं (१७) पावक शोचिषम्” (ऋ०सं० ६, ७, ११, ११) अर्थात् शीर या अनुशायी सब भूतों (प्राणियों) में प्रवेश कर के शयन करने वाले को । अथवा सब प्राणियों में अशन (व्या- पने वाले) को । 'पावक शोची' या अग्नि के समान दीप्ति (तेज) वाले को स्तुति करता हूँ ॥ ६ (१४) ॥ व्याख्या । “लोधंनयन्ति” यह जिस ऋचा का टुकड़ा है, उसमें पुराना प्रसिद्ध विश्वामित्र और वसिष्ठजी के इतिहास का एक अंश है, उसकी भगवद्दुर्गाचार्य ने व्याख्या नहीं की । क्योंकि- भग- वद्दुर्गाचार्य वासिष्ठ था और उसमें वसिष्ठ-की निन्दा है। पहिले किसी समय विश्वामित्र ब्रह्मर्षि बनने के अर्थ बहुत कालतक तप करके वसिष्ठ जी के पास गए कि- अब के बारमें मुझे वे 'ब्रह्मर्षि' कहकर संबोधन करेंगे । किन्तु वहां उनसे