निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ५३ ) ४ अ० २ पा० ७ ख० वैसे व्यवहार नहीं किया गया । अनन्तर विश्वामित्र अपने तप के लोप के भय से वसिष्ठ को शाप विना दिये ही चुप चाप लौटे । तब वसिष्ठ ने सोचा कि-इस वार इनका तप शाप से नष्ट नहीं हुआ, अतः इनका तप नष्ट करना चाहिये इसी प्रयो- जन से उनको बांध कर लाने के लिये अपने आदमी भेजे, वे गए और विश्वामित्र को पकड़ कर वसिष्ठ के साम्हने ले चले, उस समय विश्वामित्र उन पुरुषों से कहते हैं— “ न सायकस्य चिकिते जनासो लोधं नयन्ति पशु- मन्यमानाः । नावाजिनं वाजिना हासयन्ति न गर्दभं पुरो अश्वान्नयन्ति” [ ऋ०सं० ३,३,२३,३ ] अर्थात् हे जनों ! तुम ध्वंसकारी विश्वामित्र के मन्त्रगण के सामर्थ्य को नहीं जानते, इसी से मुझ तपके लोभी को पशु के समान बांधकर ले जाते हो । किन्तु वाजिन या विद्वान् अवाजिन ( मूर्ख ) को उपहास नहीं करते और गधे को घोड़े के साम्हने से नहीं ले जाते । प्रयोजन यह कि-मेरे मन्त्र बल को न जान कर मुझे ले जाने की तुम बड़ी भूल करते हो । मैं विद्वान् हूँ, उस मूर्ख वसिष्ठ की हांसी नहीं करना चाहता । एवम् घोड़े से गधे का साम्हना जैसा अनुचित है, वैसे मेरा भी उस के साथ है ॥ ६, १७ ॥ ( ७ खं० ) १ १८ १६ [निरु०] “कनीनकेव विद्रुधे नवे द्रुपदे अर्भके । १—“कनीनकेव विद्रुधे” इति वामदेवस्यार्षम् ।