निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ७८ ) ४ अ० ३ पा० ५ खं० (भा०) 'रपो' 'रिप्रम्' इति पापनामनी भवतः । शमनं च रोगाणां, यावनं च भयानाम् अथापि 'शंयुः' (४८) बार्हस्पत्य उच्यते । "तच्छंयोरावृणीमहे गातुं यज्ञाय गातुं यज्ञपतये" इत्यपि निगमोभवति (भा०) गमनं यज्ञाय, गमनं यज्ञपतये" ॥ ५ (२१) ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ४, ३ ॥ अनुवादः । 'पिता' (४७) अनवगत शब्द का निगम— "द्यौर्मे पिता"०[ऋ० सं० २, ३, २०, ३] अर्थात् 'द्यौः' ऊपर वाला द्यु लोक 'मे' मेरा 'जनिता' उत्पन्न करने वाला, 'नाभिः' वीर्य के द्वारा नाभि देश में बांधने वाला, 'पिता' बाप है । 'अत्र' इस द्यु लोक रूप पिता के जल दान से अनुगृहीता होने पर, 'बन्धुः' अङ्ग के सम्बन्ध को करने वाली 'मही' पूजनीया 'इयम्' यह 'पृथिवी' पृथ्वी 'मे' मेरी 'माता' मा है । 'उत्तानयोः' ऊपर को उठे हुए 'चम्वोः' द्यु लोक और पृथिवी लोक के 'अन्तः' बीच में 'योनिः' अवकाश दान से मिलाने वाला अन्तरिक्ष (आकाश) लोक है । 'अत्र' इस में 'पिता' द्युलोक ने 'दुहितुः' पृथिवी के ऊपर 'गर्भम्' सब प्राणियों की उत्पत्ति का कारण रूप जल (गर्भ) धारण किया । निरुक्तार्थ द्यु लोक मेरा 'पिता' पालने वाला है । अथवा