भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 499

हिन्दी निरुक्त ( ८० ) ४ अ० ४ पा० १ खं० निरुक्तार्थ—यज्ञ के लिये गमन । यज्ञपति (यजमान) के लिये गमन ॥ ५ ( २१ ) ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ४, ३ ॥ चतुर्थेऽध्याये- चतुर्थः पादः । ( १ खं० ) [ निरु० ] ‘ अदिति ’ (४१) अदीना देव- माता ॥ १ ( २२ ) ॥ अनुवादः । ‘अदिति’ यह अनवगत पद है । १ (२२) क्योकि-इसमे प्रकृति और प्रत्यय तथा अर्थ की प्रतीति नहीं होती । ‘अदीना’ इसका अवगम और देवमाता इसका अर्थ है । निरुक्तार्थ-अदिति (४६) क्यों ? वह अदीना है, दीन नहीं है, वह क्या? देवमाता। [यह अर्थ ऐतिहासिक पक्ष से है] नैरूक्तो के मत मे ‘अदिति’ शब्द के उतने ही अर्थ है, जितने कही जाने वाली ऋचा में दिखाए है । अर्थात्-द्यौ, द्युलोक अन्तरिक्ष, माता, पिता, पुत्र, विश्व सर्व देव, पञ्चजन [ गन्धर्व आदि या ब्राह्मण आदि ] जात, भूत जनित्व, [ भविष्यत् । ] ( २ खं० ) १ [निरु०] अदितिर्द्यौरदिति रन्तरिक्ष मदितिर्माता- १ “अदितिर्द्यौः” इति राहूगणस्य गोतमस्य इयमार्षम् । तृतीयसवने सर्वस्तोमेष्वेव, वैश्वदेवस्य शस्तस्य परिधानीया एषा ।