भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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हिन्दी निरुक्त ( ८१ ) ४ अ० ४ पा० २ खं०

सपिता सपुत्रः । विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना
अदिति र्जातं मदितिर्जनित्वम्' ॥ [ ऋ० सं०१०,
६, १६, ५ ]
(भा०) इति अदिते र्विभूतिमाचष्टे । एनानि
अदीनानि-इतिवा ।
“यमेरिरे (५०) भृगवः” [ऋ०सं० २,२,२,४]
(भा०) एरिर इति 'ईर्त्तिः' ( अदा० आ० ) उप
सृष्टोऽभ्यस्तः २, ( २३ ) ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थः-‘अदितिः’ देवमाता ही ‘द्यौः’ द्युलोक है ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘अन्तरिक्षम्’ अन्तरिक्ष है । ‘अदितिः’
देवमाता ही ‘माता’ सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाली
है । ‘सः’ वही ‘पिता’ पालक है । ‘सः’ वही ‘पुत्रः’ पुत्र है ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘विश्वे’ सब ‘देवाः’ देवता हैं ।
‘अदितिः’ देवमाता ही ‘पञ्च’ पांच ‘जनाः’ जन हैं । ‘अदितिः’
देवमाता ही ‘जातम्’ बहुत क्या ? सर्वथा ही जो कुछ जगत्
में उत्पन्न हुआ हुआ है, सब है । ‘अदितिः’ देवमाता ही
‘जनित्वम्’ जो होनहार जगत् है, सब है ॥
इस मन्त्र में ऋषि ( जिसे मन्त्र का साक्षात्कार हुआ )
अदिति की विभूति को कहता है । [ क्योंकि देवता महाभाग्य
होता है, उसे सब सम्भव है । यह माहाभाग्य दैवत काण्ड में
कहा जावेगा । ]
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