निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( ८८ ) ४ अ० ४ पा० ४ ख०
“अथाप्यस्यैको रश्मिश्चन्द्रमस प्रति दीप्यते, ०-० सोऽपि ‘गोः’
इत्युच्यते-“अत्राह गोरमन्वत” इति तदुपरिष्टाद् व्याख्यास्यामः”
अर्थात् “और इस (आदित्य) का रश्मि (किरण) चन्द्रमा में लग
कर चमकता है, ०-० सो भी ‘गो’ कहलाता है—इसका निगम है—
“अत्राह गोरमन्वत” इसकी व्याख्या आगे करेंगे। वही यह अब
कहा जाता है—
[निरू०] [मन्त्रार्थ-] ‘अत्र-ह’ इसी ‘चन्द्रमसः’ चन्द्र के ‘गृहे’
मण्डल में अन्य ‘त्वष्टुः’ सूर्य की रश्मियों ने ‘गोः’ सुषुम्णा
नामक रश्मि का ‘नाम’ अवस्थान ‘अमन्वत’ माना।
निरुक्तार्थ-आदित्य की रश्मियों ने इसी में गो (सुषुम्णा
रश्मि) को माना। अपना अवस्थान, जो ‘अपीच्य’ (अपचित)
सूर्यमण्डल से हटकर चन्द्रमण्डल में लगा हुआ, (अपगत) गया
हुआ, (अपिहित) रखा हुआ, [अन्तर्हित] अथवा भीतर घसा
हुआ। उस चन्द्रमा के गृह (मण्डल) में॥
‘गातु’ (५५) शब्द का [नि०अ०४,पा०३,खं०५,] व्याख्यान
हो चुका। (“गातुं कृण्वन्नुषसो जनाय” यह भी नि-
गम है।)॥
‘दंसयः’ (५६) यह अनेक कर्मों का नाम है। [क्यों कि-
कर्मों के करने वाले] इन्हें दंसन (ग्रहण) करते हैं। [निगम]
“कुत्साय” ०-०[ ऋ० सं० १, ६, ३०, २, ] अर्थात्—
“सन्मन् (मन्यमानाः) मानते हुए ‘कुत्साय’ कृषक के लिये
‘अह्नः’ जल (देने) ‘च’ और ‘दंसयः’ उस के कर्मों को सफल
करने” यह भी निगम है।
‘तूताव’ (५७) (तुताव) इस अनवगत पद का निगम—
“स तूतताव” ०—० [१, ६, ३०, २] अर्थात् ‘सः’
वह ‘तूताव’ (वर्द्धते) बढ़ता है। ‘एनम्’ इस को ‘अंहतिः’