निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६० ) ४ अ० ४ पा० ४ खं० अर्थात्--हे अग्ने ! तू 'ऋधक्' समृद्ध होता हुआ 'अयाः' आया अथवा यज्ञको बढ़ाते हुएने यजन किया । 'उत' और 'ऋधक्' बढ़ते हुए ने 'अशस्तिहाः' विघ्नों को शान्त किया । ' अस्याः ' ( ६१ ) और 'अस्य' (६२) ये दोनों मुख्य अर्थ में उदात्त होते हैं, और विशेषण या गौण अर्थ में अनुदात्त होते हैं । क्यों ? जो उत्कृष्ट या अधिक गुणयुक्त होता है, वह उदात्त होता है और अल्प या हीन गुणयुक्त अनुदात्त होता है । (लोक में भी 'यह कुल उदात्त (समृद्ध) है'ऐसा प्रसिद्ध है ।) प्रधान वाचक 'अस्या' (६१) का निगम— “ अस्या ऊषुणः ” ०-० [ ऋ०सं० २, २, २, ४ ] अर्थात्-हे 'अजाश्व' हे पूषन् ! 'अस्याः' ( अस्यै ) इस 'सातये' लब्धि के लिये ( जिस प्रकार हम वाञ्छित अर्थ को प्राप्त हों ) 'नः' हमारे 'उप' समीप 'भुवः' ( भव ) हो । ( क्योंकि-आप के निकट होनेसे हम इस वाञ्छित अर्थ को प्राप्त हो सकते हैं ।) ( कैसे पास आओ ? ) ‘ अहेलमानः ’ ( अक्रुध्यन् ) क्रोध न करते हुए । ( क्योंकि-सभी याचना करने से क्रोधकरता है । ) (फिर कैसे आ ?) ‘ररिवाञ्’ दान के अभिप्राय से युक्त होकर ‘अजाश्व’ हे अजनाश्व ! (शीघ्र चलने वाले घोड़ों वाले ! अथवा छाग ( बकरा ) रूप घोड़े वाले ' ॥ (‘अ वस्यताम् धन की इच्छा करते हुओं के 'अजाश्व' हे छाग अश्व वाले ! ॥ ) निरुक्तार्थ —इस लब्धिके लिए हमारे पास आ । 'अहेल- मानः' नहीं क्रोध करता हुआ । 'ररिवान्' कैसे ? ('रा'अदा० प०) धातु 'अभ्यस्त' या दोहराया हुआ है। ' अजाश्व ' यह पूषादेव को कहता है । (अर्थ क्या ? ) अजनाश्व । 'अज नाम अजन ( चलने वाले ) । अब अनुदात्त । —