निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 533, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमाध्यायः ५. प्रथमः पादः खं० १ ( अथ चतुरशीतिः ( ८४ ) पदानि ) [निघ०-] सस्निम् ॥ १ ॥ 'सस्निम्' यह-पद अर्थानवगत है। क्योंकि-इसमें अर्थकी प्रतीति नहीं होती । 'सस्नि' पद का प्रत्यंच वृत्ति शब्द 'सस्नात' है और इसका वा- च्यार्थ मेघ होता है । [ निरु०- ] ॐ "सस्निमविन्दच्चरणेनदीनाम्" [ऋ० सं० ८, ७, २७, ६] 'सस्निं' संस्नातं मेघम् ॥१॥ (इन्द्रः) इन्द्रने 'नदीनाम्' जलों के 'चरणे' विचरने के स्थान (अन्तरिक्ष) में 'सस्निम्' संस्नात या जलोंसे सब ओर से लिपटे हुये (धोये हुये) मेघ को 'अविन्दत्' पाया । 'सस्नि' क्या? संस्नात धोया हुआ या लिपटा हुआ । वह क्या ? मेघ । व्याख्या । मन्त्र में 'सस्निम्' पदसे मेघ का ग्रहण किया गयाँ उस का यह अभिप्राय है, कि-इन्द्र ने आकाश देश में 'सस्नि' को पाया, तो वहां मेघ के अतिरिक्त इन्द्र किस वस्तु को पाता ? सुतराम् 'सस्नि' पदं मेघ का ही बोधक हो सकता है। इसी रीति से मन्त्रों में अनिर्णीत पदार्थों का अनुमान कर लिया जाता है ॥ १ ॥