निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त (११६) ५ अ० १ पा० खं० १
[निघ०] वाहिष्ठः ॥२॥ दूतः ॥३॥
इन दोनों में प्रथम गुणानवगत (विशेषणानवगत) और दूसरा स-
स्कारानवगत है।
[निरु०] “वाहिष्ठो वां हवानां स्तोमो दूतो हुव-
न्नरा !” [ऋ० सं० ६, २, २९, १]
वोढृतमो हानानां स्तोमो दूतो हुवन्नरौ ।
नरा मनुष्याः । नृत्यन्ति कर्मसु ।
दूतो जवतेर्वा द्रवतेर्वा वारयतेर्वा ।
(“दूतो देवानामासि मर्त्यानाम्” इत्यपि निग-
मो भवति) ॥
‘नरा’ (हेनरौ) हे नरों ! अश्विनों ! ‘हवानाम्’ (हाना-
नाम्) आह्वान करने वालों में ‘वाहिष्ठः’ (वोढृतमः) अति आ-
वाहन करने वाले ‘दूतः’ दूत समान ‘स्तोमः’ (इस) स्तोम
(मन्त्र समूह) ने ‘वाम्’ तुम दोनों को ‘हुवत्’ (आह्वयत्)
बुलाया ।
‘नर’ मनुष्य (भी) कहे जाते हैं । क्यों ? ‘नृत्यन्ति कर्म-
सु’ वे कर्मों में नाचते हैं ।
‘दूत’ गति अर्थ में ‘जु’ (भ्वा०प०) धातु से है । अथवा
गति अर्थ में ‘द्रु’ (भ्वा० प०) धातु से है । अथवा ‘वारि’
(वृञ्-णिच्) (चु०उ०) धातु से है ।
(“दूतो देवाना०”) (‘तू देवताओं और मनुष्यों
का दूत है’ यह भी निगम है ।) ॥