निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (११७) ५ अ० १ पा० १ खं० [निघ०-] वावशानः ॥४॥ [ निरु०- ] वावशानो वष्टे र्वा । वाश्यते र्वा । 'वावशान' (४) शब्द 'वश' कान्तौ (अ० प०) धातु से है। (क्योंकि-वह कान्ति (इच्छा) वाला है।) अथवा शब्दार्थक 'वाश' (दि०प०) धातुसे है। (क्योंकि-वह शब्द करता है।) [ निरु०- ] “सप्त स्वसॄरारुषी र्वावशानः” [ ऋ०सं० ७,५,३३,५] इत्यपि निगमो भवति ॥ 'वावशानः' कामना करते हुये अथवा शब्द करते हुये अग्निने 'सप्त' सात (७) 'स्वसॄः' भगिनियों जैसी अथवा साथ सर्पण (गमन) करने वाली 'आरुषीः दीप्त (प्रज्वलित) अपनी ज्वाला (जिह्वा) ओंको ('उज्जभार' ऊपर को उठाया) यह भी निगम है। 'उज्जभार' (उठाया) क्रियाके सम्बन्ध से 'वावशान' शब्द कामना अर्थ में या शब्द अर्थ में निश्चित होता है। क्योंकि-जो उठाता है, वह कामना से ही अथवा शब्द करके ही उठाता है ॥ [निघ०-] वार्यम् ॥५॥ (निरु०-) वार्यं वृणोतेः । अथापि वरतरम् । 'वार्य' शब्द 'वृञ्' वरणे (स्वा०उ०) धातुसे है। (क्यों कि-वह वरने (स्वीकार करने) योग्य होता है।) और कदाचित् बहुत श्रेष्ठ भी 'वार्य' कहा जाता है। [निगम- ] (निरु०-) “तद्वार्थं वृणीमहेवरिष्ठं गोपयत्यम्” (ऋ० सं० ६, २, २३, २)