निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (११८) ५ अ० १ पा० १ खंड हम 'तत्' उस 'वार्यम्' वरने योग्य धनको 'वृणीमहे' मांगते हैं, जो 'वरिष्ठम्' बहुत श्रेष्ठ और 'गोपायतव्यम्' रक्षा करने योग्य है । (निरु०-) तद् वार्यं वृणीमहे वरिष्ठं गोपायि- तव्यं गोपायितारो यूयं स्थ, युष्मभ्यमिति वा ॥ उस वरणीय धनको हम मांगते हैं, हे स्तोताओ ! जो अतिश्रेष्ठ और गोपनीय (रक्षणीय) या तुम जिसके रक्षक हो, अथवा तुम्हारे लिये जो हो ॥ रक्षा के सम्बन्ध से 'वार्य' शब्द धन का विशेषण है, यह अवगम होता है ॥ ४ ॥ [निघ०-] अन्धः ॥ ६ ॥ [निरु०-] 'अन्धः' इति अन्ननाम । आध्यानीयं भवति "आमत्रेभिः सिञ्चतामद्यमन्धः" ॥ (ऋ० सं० २,६,१३,१) आसिञ्चत अमत्रैर्मदनीयम् अन्धः। अर्थ-'अन्धस्' यह अन्न का नाम है । क्यों? आध्यानीय है, या वह सब का प्रार्थनीय है । 'आध्यानीय' यह शब्द- समाधि है । निगम निरुक्तार्थ-हे अध्वर्युओ ! तुम 'आमत्रेभिः' (अमत्रैः) (सोमचमसैः) सोमचमस पात्रों से 'मद्यम्' (मदनीयम्) मद देने वाले 'अन्धः' सोमरूप अन्न को 'आसिञ्चत' अग्नि में सींचो ॥ (निरु०-) अमत्रं पात्रम् । अमा अस्मिन् अदन्ति । अमा पुनः अनिर्मितं भवति । पात्रं पानात् ।