निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ' (११६) ५ अ० १ पा० २ खं० तमअपि अन्धः उच्यते। नास्मिन् ध्यानं भवति न दर्शनमन्धतम इत्याभिभाषन्ते । अयमपि इतरः अन्धः एतस्मादेव । “पश्यदक्षण्वान्न विचेतदन्धः” (ऋ० सं २, ३, १७, १)। इत्यपिनिगमो भवति ॥ १ ॥ अर्थ- 'अमत्र' पात्र होता है। क्योंकि- इसमें 'अमा' अपरिमित खाया जाता है। 'अमा' नाम अनिर्मित (जिसका मान नहीं) का है। 'पात्र' क्यों ? पान से। क्योंकि-उससे पान (पीना) होता है। 'तमस्' (अन्धकार) भी 'अन्धस्' कहाजाता है। क्यों कि-इसमें ध्यान (उज्ज्ञान) नहीं होता। क्योंकि-उसमें नेत्रकी दृष्टि रुकजाती है। लौकिक लोग भी 'दर्शन नहीं होता, अन्धन्तम है, ऐसा कहते हैं। यह भी दूसरा अन्ध (मनुष्य) इसी से है। क्योंकि-वह भी देखता नहीं है। “'अक्षण्वान्' नेत्रवाला या दर्शनवान् या विज्ञानवान् पुरुष 'पश्यत्' देखता है, या नित्य ही जानता है। किन्तु 'अन्धः' दर्शनरहित या वेद, उपनिषद्, आदि सत् शास्त्रों को नहीं जानने वाला 'न' नहीं 'विचेतत्' (विजानाति) जानता है।” यह भी निगम है॥ यहां 'अक्षण्वान् देखता है, और अन्ध नहीं देखता,-इस वाक्य सम्बन्धसे 'अन्धः' शब्द अन्धे को ही कहता है; यह युक्ति है॥ (सं० २) (निघ०-) असश्चन्ती ॥ ७ ॥