निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 538, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ें(निरु०-) “असश्चन्ती भूरिधारे पयस्वती ।” (ऋ० सं ५, १, १४, २) । असज्यमाने इतिवा । अव्युदस्यन्त्यौ-इतिवा । बहुधारे उदकवत्यौ ॥ 'असश्चन्ती' (७) पद अनवगत है । “असज्यमाने” अथवा “अव्यु- दस्यन्त्यौ” यह अर्थ की प्रतीति है । 'असश्चन्ती' (असज्यमाने) आपस में नहीं मिलती हुई, या (अव्युदस्यन्त्यौ) एक को एक नहीं छोड़ती हुई, 'भूरिधारे' (बहुधारे) बहुत भरने वाली 'पयस्वती' (उदकवत्यौ) जल वालीं (द्यावा पृथिवी हैं ।) । इस मन्त्र में 'भूरिधारे' इत्यादि पदों के साथ समान विभक्ति वाला होने से 'असश्चन्ती' पद द्यावा पृथिवी (द्य- लोक-भूलोक) का विशेषण है, यह सिद्ध होता है ॥ (निघ०-) वनुष्यति ॥ ८ ॥ (निरु०-) वनुष्यतिर्हन्तिकर्मा अनवगतसंस्का- रो भवति । “वनुष्याम वनुष्यतः” इत्यपि निगमो भवति । “दीर्घप्रयज्युमति यो वनुष्यति वयं जयेम पृत- नासु दूढ्यः ।” दीर्घप्रततयज्ञम्-अभिजिघांसतियो, वयं तं जयेम पृतनासु 'दूढ्यं' दुर्धियं पापधियम् । पापः पाता अपेयानाम् । पापत्यमानः अवाङ्