भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 539, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 539

हिन्दी निरुक्त ( १२१ ) ५ अ० १ पा० २ खं० एव पतति इतिवा । पापत्यते वा स्यात् । अर्थः—'वनुष्यति' (८) यह पद 'हन्ति' के (हिंसा) अर्थ में रहता हुआ अनवगत संस्कार है। “हम 'वनुष्यतः' अपने को मारते हुओं को 'वनुयाम' मारते हैं।” यह भी निगम है। 'यः' जो 'दीर्घप्रयज्युम्' (दीर्घप्रततयज्ञम्) लम्बे (बहुत कालतक) फैले हुए यज्ञ को 'अतिवनुष्यति' (अभिजिघांसति) आभिमुख्य से नष्ट करता है, 'वयम्' हम (तम्) उस 'दूढ्यः' (दू- ढ्यं दुर्धियं पापधियम्) दूढ्य या दुष्टधी (बुद्धि) वाले या पाप- बुद्धि वाले को 'पृतनासु' संग्रामों में 'जयेम' जीतें। 'पाप' क्या? पीने वाला–अपेयों (न पानयोग्यों) का। अथवा जो फिर फिर गिरता हुआ नीचे को ही गिरता है। अथवा पतनार्थक 'पत' (यङन्त) धातुसे है। क्योंकि–वह बहुत या फिर २ गिरता ही है॥ [निघ०-] तरुष्यति ॥६॥ [निरु०-] तरुष्यतिः अपि एवंकर्मा । “इन्द्रेण युजा तरुषेम वृत्रम्” (ऋ० सं० ५, ४, १५, २) इत्यपि निगमो भवति । अर्थः–'तरुष्यति' (६) पद भी 'हन्ति' के (हिंसा) अर्थ में है। “हम 'इन्द्रेण' इन्द्रके साथ 'युजा' युक्त हुये 'वृत्रम्' शत्रु को 'तरुषेम' मारें” यह भी निगम है॥ [निघ०-] भन्दनाः ॥१०॥ १६

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