निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 540, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १२२ ) ५ अ० १ पा० २ खं० [ निरु०- ] भन्दनाः, भन्दतेः स्तुतिकर्मणः। "पुरुप्रियो भन्दते धामभिः कविः" (ऋ० सं० २, ८, २०, ४) इत्यपि निगमो भवति। "सभन्दना उदियर्त्ति प्रजावतीः" (७, ३, २०, १) इति च। अर्थः—'भन्दन' शब्द स्तुति अर्थ वाले 'भन्द्' (भ्वां० प०) धातु से है। " 'पुरुप्रियः' बहुत कामनाओं वाला 'कविः' (क्रान्तद- र्शनः) फैले हुए ज्ञान वाला स्तोता (अग्निम्) अग्निको 'धा- मभिः' अनेक नामों से 'भन्दते' (स्तौति) स्तुति करता है" यह भी निगम है। क्यों कि-स्तुति करने वाला अनेक नामों से स्तुति के अतिरिक्त क्या करेगा, इस लिये 'भन्दते' धातु का स्तुति ही अर्थ निश्चय होता है। " 'सः' वह यजमान, जो 'मेरे यहां यज्ञ कर्म हो, तो मैं सोम को निचोडूं' ऐसी नित्य कामना रखता है, 'प्रजावतीः' प्रजा के चिन्हों से युक्त (प्रजाओं को उचित) 'भन्दनाः' स्तु- तियों को 'उदियर्त्ति' उदीरता या गाता है ॥" और यह निगम है। यहां 'भन्दनाओं को गाता है इस गाने के संबन्ध से 'भन्दना' शब्द स्तुति का वाचक ही हो सकता है। पहिला उदाहरण आख्यात और दूसरा यह नाम (प्रातिपदिक) के रूप में हुआ। दोनों ही प्रकार से प्रयोग आता है, इस से दोनों दिखाए हैं॥