निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १२३ ) ५ अ० १ पा० ३ खं० (निघ०-) आहनः ॥११॥ [निरु०] “अन्येन मदाहनो याहि तूयम्” । ( ऋ० सं० ७, ६, ७, ३ ) ॥ अन्येन मत् आहनो गच्छ क्षिप्रम्, आहांसि इव भाषमाण, इति असभ्यभाषणात् आहना इव भवति, एतस्मात् आहनः स्यात् । ‘आहनः’ यह पद सम्बोधन अनवगत है । क्यों कि-इसमें अर्थ की प्रतीति नहीं होती । “आहांसि” यह अर्थ की प्रतीति है । “ न तिष्ठन्ति न निमिषन्त्येते देवानां स्पश इहये चरन्ति । अन्येन मदाहनो याहि तूयं तेन विवह रथ्येवंचक्रा ॥ ( ऋ० सं० ७, ६, ७, ३ ) यम और यमी का संवाद-सूक्त है, वहा यह यम का वाक्य है । वह मैथुन के लिये प्रार्थना करती हुई यमी को कहता है— हे यमि ! तू मत समझ, इस समय एकान्त है, किन्तु ‘ न तिष्ठन्ति ’ [ छिद्र देखनेवाले जन क्षणमात्र भी ] नहीं रुकते, और ‘न’ निमिषन्ति’ नहीं पलक झिंपाते, [ बराबर फिरते और देखते रहते हैं । ] कौन ? ‘एते’ ये ‘देवानां स्पशः’ देवताओंके गुप्तचर, ‘ये’ जो ‘इह’ इस संसारमें ‘चरन्ति’ विच- रते हैं । इससे कहता हूं—हे ‘आहनः ! ’ असभ्य भाषण से हनन करने वाली ! ‘मत्’ मुझसे ‘अन्येन’ दूसरे कुलमें उत्पन्न हुए पुरुष के साथ तू ‘तूयम्’ शीघ्र ‘याहि’ मैथुन को प्राप्त हो मैं तेरे इस असभ्य वचन को सुन भी नहीं सकता, करना तो दूर रहा । अतः तू दूसरे ही पुरुष के साथ मैथुन ( रति ) के