निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १२४ ) ५ अ० १ पा० २ खं० लिये विचर । ‘तेन’ उसी से ‘विवह’ विवाह कर । ‘रथ्या इव चक्रा’ जैसे एक रथमें दो चक्र (पहिये) जुड़े हुए होते हैं, उसी प्रकार एक मनकर, उसी प्रयोजन में तेरे साथ वह कामी और तू उसके साथ, दोनों जुड़ जाओ । किन्तु इस प्रयोजन से तू मुझे कम्पित नहीं कर सकती, यह अभिप्राय है ॥ गरुड़पुराण के देव दूतों की बात को अवैदिक समझने वाले तथा बहिन भाईके योनि संबन्धको वैदिक बनाने वाले इस मन्त्र की ओर घूरकर देखें ! निरुक्तार्थ-हे आहनः ! मुझसे दूसरे के संग शीघ्र जा । ‘आहनः’ क्यों ? मारती हुई जैसो है, बोलती हुई अर्थात्- असभ्य (गन्दे) भाषण (बोल चाल) से आहना (मारने वाली) जैसी होती है । पुरुष भी इसी से ‘आहन’ हो सकता है । [क्योंकि-जिसके समीप ऐसा असभ्य वचन होता है, उसका भी आहनन होता है ] ॥ इस मन्त्र में मैथुन-समाचार अनिष्ट होने से ‘आहनः’ यह यमीके- लिये सम्बोधन है, ऐसा निश्चय हो जाता है ॥ [निघ०] नदः ॥१२॥ [निरु०] ऋषिर्नदो भवति, नदतेःस्तुतिकर्मणः ॥ “नदस्य मारुधतः काम आगन् ॥” [ऋ०सं० २, ४, २२, ४ ] ॥ नदनस्य मा रुधतः काम आगमत् । संरुद्ध- प्रजननस्य ब्रह्मचारिणः,-इति ऋषिपुत्र्या विलापितं वेदयन्ते ॥ २ ॥