भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 543

हिन्दी निरुक्त ( १२५ ) ५ अ० १ पा० २ खं० अर्थः— 'नद्' ( १२ ) क्या ? ऋषि होता है , स्तुति अर्थ में 'नद्' ( भ्वा० प० ) धातु से है । अर्थात्-जब ऋषि देवताओं की स्तुति करता है,तब ऐसा प्रतीत होता है,मानों यह संसार के विषयोंको तिरस्कार करता हुआ नाद (गर्जना) करता है, इसी से वह 'नद्' कहा जाता है। लोक में भी जब कोई किसी का बल पूर्वक तिरस्कार करता है, उस समय उसे नाद करता है, धाड़ता है, गर्जता है, इत्यादि कहते हैं । प्रयोजन यह है कि-'नदः' ऐसा कहने से व्याख्येय शब्द का ज्ञान होता है, कि-इसका व्याख्यान होगा । फिर 'ऋषि र्भवति' (ऋषि है ) ऐसा पर्याय देने से ज्ञान होता है कि- अन्तमें ठीक इसी वस्तु ( अर्थ ) पर इस शब्द को रहना है । फिर 'नदतेः स्तुतिकर्मणः' (स्तुत्यर्थक 'नद्' धातु से है । ) इस से व्युत्पत्ति या उस शब्द के संस्कार ( प्रकृति-प्रत्यय ) का ज्ञान होता है-कैसे बना ? क्या व्याकरण से विरुद्ध नहीं ? तथा उसके तत्वके कुछ समीप पहुंचता है । फिर 'नदति-इव' ( नाद जैसा करता है ) इससे उस अर्थ की प्रतीति होती है, जो उसमें घटता हो अर्थात्-व्युत्पत्ति 'नदति' (नाद करता है) है, किन्तु विद्वान् ऋषि नाद ( अव्यक्त वाणी ) नहीं करता, वह व्यक्त वाणी बोलता है अतः अर्थ की प्रतीति अपेक्षित होती है-'नदति इव' ( नाद जैसा करता है ) अर्थात्-नाद नहीं करता, नाद जैसा करता है । जब संसार के विषय उसके साम्हने आते हैं, उन्हे' वेदार्थ-विज्ञान के बलसे बलपूर्वक तिरस्कार करता है। लोक में भी जो बलपूर्वक किसी का प्रत्याख्यान करता है, उसे ' गर्जता है , गर्जन करता है, इत्यादि कहते हैं यह प्रकार शब्द के अर्थ को घटाने बढ़ाने