भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 544

में उपयुक्त होता है, निर्वचन में इस की बड़ी आवश्यकता है “नदस्य मा रुधतः काम आगन्नित आजातो अमुतः कुतश्चित् । लोपामुद्रावृषणं नीरिणाति धीरमधीरा धयति श्वसन्तम् ॥” (ऋ० सं० २, ४, २२, ४) ॥ अगस्त्य ब्रह्मचारी और लोपामुद्रा ऋषिपत्नी के संवाद सूक्त में यह लोपामुद्रा का वचन है । वह अगस्त्य को भर्त्ता समझ कर बोली— ‘नदस्य’ (नदनस्य) देवताओं की स्तुति करने वाले इस अगस्त्य को ‘रुधतः’ इन्द्रियों को रोके हुए होने से ‘मा’ मुझे ‘कामः’ काम ‘आगन्’ आया, जिससे मैं अब पीड़ित हो रही हूं । सो मैं नहीं जानती कि-वह ‘इतः’ ( एव मच्छरीरात् ) इस मेरे ही शरीर से ‘आजातः’ आया, अथवा ‘अमुतः’ उस अगस्त्य के शरीर से, क्योंकि-पुरुष के गुणों को स्मरण करनेसे स्त्री को काम हो जाता है (प्रकट होता है) और पुरुष को स्त्री के स्मरण से । इसी से काम को ‘स्मर’ कहा जाता है । इस से यह उपपन्न होता है,-इस मेरे शरीर से या उस नद् के शरीर से आया । अथवा ‘कुतश्चित्’ कहीं से आया, यह भी वस्तुतः नहीं जानती । ‘लोपामुद्रा’ इस प्रकार विलाप करती हुई लोपामुद्रा ‘वृषणम्’ वीर्य के बरसाने वाले अगस्त्य को ‘नीरिणाति’ निश्चय अधिकता से या काम दोष से प्राप्त होती है ‘रिणाति’ धातु गत्यर्थों में पढ़ा है । अथवा ‘निरि- णाति’ (चेतसा उपगच्छति) मनसे उसे प्राप्त होती है । क्यों- कि-वाञ्छित पुरुष का अनुचिन्तन करना स्त्री का स्वभाव ही होता है । इससे ऐसा सिद्ध होता है । ‘धीरम्’ ब्रह्मचर्य में