भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 545, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 545

हिन्दी निरुक्त ( १२७ ) ५ अ० १ पा० ३ खं० स्थिर बुद्धि अगस्त्यकी 'अधीरा' चञ्चल इन्द्रियों वाली 'धयति' मनसे पी जैसे रही है अथवा नेत्रों से देखती है। 'श्वसन्तम्' चित्त से उससे हटते हुए को भी (धयत्येव) पान कर ही रही है। “श्वसति, नदति” ऐसा गत्यर्थों में पढ़ा है। इस प्रकार लोपामुद्रा के वाक्य में “नदस्य रुधतो माम् आगमत् कामः” इस प्रकरण से 'नद' शब्द से ऋषि कहा जाता है, यह सिद्ध होता है “संरुद्ध प्रजननस्य ब्रह्म- चारिणः” अर्थात्-“रोक दिया है, गर्भ का आधान जिस ने ऐसे ब्रह्मचारी के,” ये पद ऋषि पुत्री के विलाप को जना रहे हैं॥ २॥ ( खं० ३ ) [निघ०-] सोमोअक्षाः ॥ १३ ॥ (निरु०) “न यस्य द्यावा पृथिवी न धन्व ना- न्तरिक्षं नाद्रयः सोमोअक्षाः।” (ऋ०सं० ८,४,१५,१) अश्नोतेः इत्येवम्-एके। अनूपे गोमान् गोभिरक्षाः सोमो दुग्धाभिरक्षाः। ( ७, ५, १३, ४ ) “लोपाशः सिंहं प्रत्यञ्चमत्साः ।” क्षियति निगमः पूर्वः, क्षरति निगमःउत्तरः इत्येके। 'अनूपे गोमान् गोभिर्यदा क्षियति, अथ सोमो दु- ग्धाभ्यः क्षरति। सर्वे क्षियतिनिगमाः इति शाकपूणिः॥

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