भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 547

निगम है, और दूसरा 'अक्षाः' पद 'क्षरति' (भरने) का निगम है। यह कोई आचार्य मानते हैं। शाकपूणि आचार्य कहते हैं कि ये पूर्वोक्त सब निगम 'क्षियति' (निवास) अर्थ के ही हैं। प्रथम उदाहरण में जिस इन्द्र का द्यावापृथिवी निवास नहीं, न जल और न अन्तरिक्ष, अपितु सोम ही इन्द्र का निवास है। "अनूपे" मन्त्रमें जब गोमान् अनूप (सजल) देश में निवास करता है. तब दोही हुई गोत्रों में भी सोम निवास करता ही है किन्तु वे दूध के रूप में सोम से खाली नहीं होतीं इस प्रकार तीनों ही स्थानों में निवास अर्थ घट जाता है। यही शाकपूणि का मत है। [निघ०-] श्वात्रम् ॥१४॥ [निरु०] 'श्वात्रम्' (१४) इति क्षिप्रनाम। आशु अतनं भवति । "स पतत्रीत्वरं स्था जगद्यच्छ्वा- त्रमग्निरकरोज्जातवेदाः ।" (ऋ० सं० ८,४,१०,४) स. पतत्रि च इत्वरं स्थावरं जङ्गमं च यत्, तत् क्षिप्रम् अग्निरकरोज्जातवेदाः ॥ अर्थ-'श्वात्र' यह शीघ्र का नाम है। क्यों ? वह 'आशु अतन' (जलदी जलदी चलता) है। 'सः' उस 'जातवेदाः' कार्य मात्रके जानने वाले अग्निने 'यत्' जो 'पतत्रि' इधर उधर उड़ने वाले 'इत्वरम्' पक्षी आदि, 'स्थाः' (स्थावरम्) और स्थावर वृक्ष आदि 'जगत्' (जङ्गमं च) और जङ्गम गो आदि (तत्) उस सब को प्रलय काल में 'श्वात्रम्' (क्षिप्रम्) शीघ्र 'अकरोत्' अपने में कर लिया था। १७