निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१३०) ५ अ० १ पा० ३ खं० इस प्रकार इस मन्त्र में 'रवात्रम्' यह शीघ्र का नाम है । क्यों कि स्थावर जङ्गलों को झट पट जलानेके अतिरिक्त अग्नि क्या करता ? इस से शीघ्र अर्थ का नाम निश्चित होता है । (इस मन्त्र में पौराणिक प्रलय कालीन अग्निलीला का वर्णन है ) [निघ०-] ऊतिः ॥१५॥ [निरु०] ऊतिः (१५) अवनात् । “आ त्वा रथं यथोतये” (ऋ० सं० ६, ५, १, १,) इत्यपि निगमोभवति । अर्थ-‘ऊति’ (१५) अवन (रक्षा) से है । हे इन्द्र ! ‘त्वा’ (त्वाम्) तुझे (‘आवर्तयामसि’ (आ- वर्तयामहे स्तुतिभिः) स्तुतियों द्वारा आवृत्ति (बार बार याद) करते हैं ।) किस लिये ? ‘ऊतये’ अपनी रक्षा के लिये । किस प्रकार ? ‘यथा-रथम्’ जैसे कोई समर्थ पुरुष रथ को बार बार घुमाता है । इस प्रकार आवृत्ति के संबन्ध से ‘ऊति’ शब्द रक्षा अर्थ में है ॥ [निघ०-] हासमाने ॥ १६ ॥ [निरु०] 'हासमाने' (१६) इति उपरिष्टाद्व्याख्या- स्यामः ॥ ४ ॥ अर्थ-‘हासमाने' (१६) यह पद आगे “प्रपर्वतानामु- शती उपस्थात्” पर व्याख्यान करेंगे । [निघ०] पद्धभिः ॥१७॥ [निरु०] “वम्रीकः पद्धभिरुपसर्पदिन्द्रम्” ॥