निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ
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हिन्दी निरुक्त ( १३१ ) ५ अ० १ पा० ३ खं०
पानैः-इतिवा । स्पाशनैः-इतिवा । (स्पशनैः
इतिवा ।)
पद्भिः (१७) यह अनवगत है । “पानैः” “स्पाशनै” ये शब्दसमाधि हैं ।
वम्र नाम वैखानस ऋषि बोले कि—
हे इन्द्र ! ‘वम्रः’ पूर्व कल्प के वम्र ने ‘पद्भिः’ सोम
पानो ( की भेट ) से (इन्द्रम्’ पूर्व कल्पके इन्द्र को ‘उपसर्पत्’
शरण किया ( इन्द्र की शरण ली ) यहां शब्द की समानता
और प्रकरण से ‘पद्भिः’ यह पान का नाम है ॥
[निघ०] ससम् ॥१८॥
(निरु०) “ससं न पक्वमविदच्छुचन्तम् ।” (ऋ०
सं० ८, ३, १४, ३) स्वपनमेतत् माध्यमिकं ज्योतिः
अनित्यदर्शनं तदिव अविदद् जाज्वल्यमानम् ॥
‘ससम्’ ( १८ ) यह अनवगत पद है । ‘स्वपनम्’ यह अव-
गम ( अर्थ बोधक पद ) है ।
अर्थः—‘ससम्’ (स्वपनम् एतत् माध्यमिकं ज्योतिः अनि-
त्यदर्शनम् तद् ) स्वपन ( सोने वाला ) यह मध्यम (अन्तरिक्ष)
लोक का ज्योति ( बिजली ) जो अनित्यदर्शन अर्थात् आठ
(८) मास तक दिखाई नहीं देता, किन्तु वर्षा ऋतु में ही
दिखाई देता है, तथा ‘पक्वम्’ आकाश देशमें प्रकट होने
वाला है, उसके ‘न’ (इव) समान किसी ऋषिने या और ने
भूमिके सजल तृणयुक्त देशमें ‘शुचन्तम्’ (जाज्वल्यमानं) चमकते
हुये इस अग्नि को ‘अविदत् पाया या जाना ।
• यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से ‘ससं’