निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दसे स्वपन (सोनेवाले) का ग्रहण होता है, तथा वह मध्यम लोक की ज्योति बिजली ही है, उसी की उपमा मन्त्र में अग्नि को दीगई है ॥ (निघ०) द्विता ॥१६॥ (निरु०-) “द्विताच सत्ता स्वधयाच शम्भुः ।” ( ऋ० सं० ३, १, १७, ५) । द्वैधं सत्ता मध्यमे च स्थाने उत्तमे च । शम्भुः सुखभूः ॥ ‘द्विता’ (१६) यह अनवगत है । 'द्वैधम्' (दो प्रकार से ) यह अवगम है । अर्थ-हे अग्ने ! तुझ से पूर्व होता वायु की 'द्विता' (द्वैधंसत्ता ) दो प्रकार की विद्यमानता है। अर्थात्- (मध्यमे च स्थाने उत्तमे च ।) मध्यम स्थान में विद्युत् (बिजली) के रूपमें और उत्तम स्थान द्युलोक में सूर्य के रूपमें है । 'स्वधया च' और वह अन्न के द्वारा सब प्राणियों को 'शम्भु' (सुख- भूः) सुख देनेवाला है। यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से 'द्विता' शब्द 'द्वैध' के अर्थ में है ॥ (निघ०) व्राः ॥ २० ॥ (निरु०-) “मृगं न व्रा मृगयन्ते ॥” [ऋ०सं०५, ७, १८, १] मृगमिवव्रात्याः प्रैषाः ॥३॥ 'व्राः' (२०) यह अनवगत है । 'व्रात्याः' यह अवगम है ॥ अर्थ-हे भगवन् ! इन्द्र ! 'व्राः' (व्रात्याः-प्रैषाः ) हमारे प्रैष मन्त्र ( 'व्राः' = व्रात्याः = व्याधाः) व्याध 'मृगं-न' (इव) ' मृगको जैसे, तुझे 'मृगयन्ते' ढूंढते हैं ॥ यहां पर मृग के सम्बन्ध से 'व्रा' शब्द व्रात्य या लुब्धक (व्याध) का नाम है ॥ ३ ॥