निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
पृष्ठ 551, कुल 1282 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १३३ ) ५ अ० १ पा० ४ खं० ( खं० ४ ) (निघ०-) वराहः ॥२१॥ (निरु०-) वराहो मेघो भवति । वराहारः । “वरमाहारमाहार्षीः” इति च ब्राह्मणम् । “विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता” (ऋ०सं० १, ४, २८, २) इत्यपि निगमो भवति । अयमपि इतरो वराहः एतस्मादेव । बृहति मूलानि । वरं वरं मूलं बृहति इति वा ॥ “वराह मिन्द्र एमुषम्” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, ४) इत्यपि निगमो भवति ॥ ‘वराह’ (२१) यह अनवगत और अनेकार्थ है । अर्थः—‘वराह’ मेघ होता है । क्योंकि-उसका वर (जल) आहार (भोजन) है । और “वर (जल) आहारको आहार [ भोजन ) किया । या हे पर्जन्य ! तैने श्रेष्ठ (जलरूप) आहार को (हमारे लिये) आहरण (आनयन) किया। यह ब्राह्मण है “वराहम्” (मेघम्) मेघको ‘विध्यत्’ ताडन करता हुआ ‘तिरः’ दूर ही अवस्थित (ठहरा हुआ हुआ) ‘अद्रिम्’ (वज्रम्) वज्र को ‘अस्ता’ फेंकने वाला इन्द्र ।” यह भी निगम है । यह भी दूसरा ‘वराह’ (शूकर) इसी से है । क्योंकि-यह भी वर (मूल) को आहार करता ही है । [ व्युत्पत्ति ] ‘बृहति मूलानि’ काटता है मूलों को । अथवा ‘वरंवरं मूलं बृहति’ वर वर ( अच्छे अच्छे ) मूल को बर्हण करता (काटता) है ॥