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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

हिन्दी निरुक्त (१३०) ५ अ० १ पा० ३ खं० इस प्रकार इस मन्त्र में 'रवात्रम्' यह शीघ्र का नाम है । क्यों कि स्थावर जङ्गलों को झट पट जलानेके अतिरिक्त अग्नि क्या करता ? इस से शीघ्र अर्थ का नाम निश्चित होता है । (इस मन्त्र में पौराणिक प्रलय कालीन अग्निलीला का वर्णन है ) [निघ०-] ऊतिः ॥१५॥ [निरु०] ऊतिः (१५) अवनात् । “आ त्वा रथं यथोतये” (ऋ० सं० ६, ५, १, १,) इत्यपि निगमोभवति । अर्थ-‘ऊति’ (१५) अवन (रक्षा) से है । हे इन्द्र ! ‘त्वा’ (त्वाम्) तुझे (‘आवर्तयामसि’ (आ- वर्तयामहे स्तुतिभिः) स्तुतियों द्वारा आवृत्ति (बार बार याद) करते हैं ।) किस लिये ? ‘ऊतये’ अपनी रक्षा के लिये । किस प्रकार ? ‘यथा-रथम्’ जैसे कोई समर्थ पुरुष रथ को बार बार घुमाता है । इस प्रकार आवृत्ति के संबन्ध से ‘ऊति’ शब्द रक्षा अर्थ में है ॥ [निघ०-] हासमाने ॥ १६ ॥ [निरु०] 'हासमाने' (१६) इति उपरिष्टाद्व्याख्या- स्यामः ॥ ४ ॥ अर्थ-‘हासमाने' (१६) यह पद आगे “प्रपर्वतानामु- शती उपस्थात्” पर व्याख्यान करेंगे । [निघ०] पद्धभिः ॥१७॥ [निरु०] “वम्रीकः पद्धभिरुपसर्पदिन्द्रम्” ॥

हिन्दी निरुक्त ( १३१ ) ५ अ० १ पा० ३ खं०

पानैः-इतिवा । स्पाशनैः-इतिवा । (स्पशनैः
इतिवा ।)
पद्भिः (१७) यह अनवगत है । “पानैः” “स्पाशनै” ये शब्दसमाधि हैं ।
वम्र नाम वैखानस ऋषि बोले कि—
हे इन्द्र ! ‘वम्रः’ पूर्व कल्प के वम्र ने ‘पद्भिः’ सोम
पानो ( की भेट ) से (इन्द्रम्’ पूर्व कल्पके इन्द्र को ‘उपसर्पत्’
शरण किया ( इन्द्र की शरण ली ) यहां शब्द की समानता
और प्रकरण से ‘पद्भिः’ यह पान का नाम है ॥
[निघ०] ससम् ॥१८॥
(निरु०) “ससं न पक्वमविदच्छुचन्तम् ।” (ऋ०
सं० ८, ३, १४, ३) स्वपनमेतत् माध्यमिकं ज्योतिः
अनित्यदर्शनं तदिव अविदद् जाज्वल्यमानम् ॥
‘ससम्’ ( १८ ) यह अनवगत पद है । ‘स्वपनम्’ यह अव-
गम ( अर्थ बोधक पद ) है ।
अर्थः—‘ससम्’ (स्वपनम् एतत् माध्यमिकं ज्योतिः अनि-
त्यदर्शनम् तद् ) स्वपन ( सोने वाला ) यह मध्यम (अन्तरिक्ष)
लोक का ज्योति ( बिजली ) जो अनित्यदर्शन अर्थात् आठ
(८) मास तक दिखाई नहीं देता, किन्तु वर्षा ऋतु में ही
दिखाई देता है, तथा ‘पक्वम्’ आकाश देशमें प्रकट होने
वाला है, उसके ‘न’ (इव) समान किसी ऋषिने या और ने
भूमिके सजल तृणयुक्त देशमें ‘शुचन्तम्’ (जाज्वल्यमानं) चमकते
हुये इस अग्नि को ‘अविदत् पाया या जाना ।
• यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से ‘ससं’

शब्दसे स्वपन (सोनेवाले) का ग्रहण होता है, तथा वह मध्यम लोक की ज्योति बिजली ही है, उसी की उपमा मन्त्र में अग्नि को दीगई है ॥ (निघ०) द्विता ॥१६॥ (निरु०-) “द्विताच सत्ता स्वधयाच शम्भुः ।” ( ऋ० सं० ३, १, १७, ५) । द्वैधं सत्ता मध्यमे च स्थाने उत्तमे च । शम्भुः सुखभूः ॥ ‘द्विता’ (१६) यह अनवगत है । 'द्वैधम्' (दो प्रकार से ) यह अवगम है । अर्थ-हे अग्ने ! तुझ से पूर्व होता वायु की 'द्विता' (द्वैधंसत्ता ) दो प्रकार की विद्यमानता है। अर्थात्- (मध्यमे च स्थाने उत्तमे च ।) मध्यम स्थान में विद्युत् (बिजली) के रूपमें और उत्तम स्थान द्युलोक में सूर्य के रूपमें है । 'स्वधया च' और वह अन्न के द्वारा सब प्राणियों को 'शम्भु' (सुख- भूः) सुख देनेवाला है। यहां शब्द की समानता और अर्थ की योग्यता से 'द्विता' शब्द 'द्वैध' के अर्थ में है ॥ (निघ०) व्राः ॥ २० ॥ (निरु०-) “मृगं न व्रा मृगयन्ते ॥” [ऋ०सं०५, ७, १८, १] मृगमिवव्रात्याः प्रैषाः ॥३॥ 'व्राः' (२०) यह अनवगत है । 'व्रात्याः' यह अवगम है ॥ अर्थ-हे भगवन् ! इन्द्र ! 'व्राः' (व्रात्याः-प्रैषाः ) हमारे प्रैष मन्त्र ( 'व्राः' = व्रात्याः = व्याधाः) व्याध 'मृगं-न' (इव) ' मृगको जैसे, तुझे 'मृगयन्ते' ढूंढते हैं ॥ यहां पर मृग के सम्बन्ध से 'व्रा' शब्द व्रात्य या लुब्धक (व्याध) का नाम है ॥ ३ ॥

हिन्दी निरुक्त ( १३३ ) ५ अ० १ पा० ४ खं० ( खं० ४ ) (निघ०-) वराहः ॥२१॥ (निरु०-) वराहो मेघो भवति । वराहारः । “वरमाहारमाहार्षीः” इति च ब्राह्मणम् । “विध्यद्वराहं तिरो अद्रिमस्ता” (ऋ०सं० १, ४, २८, २) इत्यपि निगमो भवति । अयमपि इतरो वराहः एतस्मादेव । बृहति मूलानि । वरं वरं मूलं बृहति इति वा ॥ “वराह मिन्द्र एमुषम्” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, ४) इत्यपि निगमो भवति ॥ ‘वराह’ (२१) यह अनवगत और अनेकार्थ है । अर्थः—‘वराह’ मेघ होता है । क्योंकि-उसका वर (जल) आहार (भोजन) है । और “वर (जल) आहारको आहार [ भोजन ) किया । या हे पर्जन्य ! तैने श्रेष्ठ (जलरूप) आहार को (हमारे लिये) आहरण (आनयन) किया। यह ब्राह्मण है “वराहम्” (मेघम्) मेघको ‘विध्यत्’ ताडन करता हुआ ‘तिरः’ दूर ही अवस्थित (ठहरा हुआ हुआ) ‘अद्रिम्’ (वज्रम्) वज्र को ‘अस्ता’ फेंकने वाला इन्द्र ।” यह भी निगम है । यह भी दूसरा ‘वराह’ (शूकर) इसी से है । क्योंकि-यह भी वर (मूल) को आहार करता ही है । [ व्युत्पत्ति ] ‘बृहति मूलानि’ काटता है मूलों को । अथवा ‘वरंवरं मूलं बृहति’ वर वर ( अच्छे अच्छे ) मूल को बर्हण करता (काटता) है ॥

हिन्दी निरुक्त ( १३४ ) ५ अ० १ पा० ४ खं० “विश्वेत्ता विष्णुराभरदुरुक्रमस्त्वेषितः । शतं महिषान्क्षीरपाकमोदनं वराहमिन्द्र एमूषम्” (ऋ० सं० ६, ५, ३०, ४) ‘उरुक्रमः’ बहुत पराक्रम वाले ‘त्वेषितः’ इन्द्र वाक्य से उत्तेजित ‘इन्द्रः’ ऐश्वर्यवान् ‘विष्णुः’ विष्णुने ‘ता’ (तानि) ‘विश्वा’ (विश्वानि) ‘इत्’ एव उन सबी धनोंको ‘आभरत्’ आहरण किया किन धनोंको लाया? ‘शतं-महिषान्’ सौ (१००) भैंसोंको, ‘क्षीरपाकम्’ दूधपाक, ‘ओदनम्’ भात ‘ एमूषम् ’ मोह करने वाले ‘ वराहम् ’ सूकर को ( लाया ) । यह भी निगम है । यहां धनोंके लाने के प्रसंगमें ‘वराह’ शब्द प्रसिद्ध वराह (सूकर) का ही नाम हो सकता है । इस मन्त्र में “त्वेषितः” पदमें ‘त्वा-इषितः’ ऐसा पद विभाग होकता है, तो भी अर्थ के अनुरोध से एक पद करके ही निर्वचन किया है ॥ (निरु०-] अङ्गिरसोऽपि वराहा उच्यन्ते । “ब्रह्मणस्पति वृषभिर्वराहैः” (ऋ०सं०८, २, १६, १) । अर्थः- अङ्गिरस् भी वराह कहे जाते हैं। “ ‘वृषभिः’ कामनाओं के बरसने वाले ‘वराहैः’ यज्ञ में बैठने वाले अङ्गिरसों से सहित ‘ब्रह्मणस्पतिः’ इन्द्र” यद्यपि इस मन्त्र में ‘वराह’ शब्द के अङ्गिरस्-वाचक होने में कोई लिङ्ग नहीं है, तो भी इस मन्त्र वाले सूक्त में “विप्रं पदमङ्गिरसो दधानाः०” [ऋ० सं० ८, २, १५, २] ऋचा में ‘अङ्गिरस्’ पद का उपादान है ॥ (निरु०-) अथापि माध्यमिका देवगणा वराहवः उच्यन्ते ।

हिन्दी निरुक्त ( १३५ ) ५ अ० १ पा० ५ खं० “पश्यन्हिरण्यचक्रानयोदंष्ट्रान्विधावतोवराहून्” (ऋ०सं० १, ६, १४, ५) ॥४॥ अर्थः-और भी मध्यम लोक के देव-गण 'वराहु' कहे जाते हैं। “हे मरुत् देवगणों ! गोतम ऋषि तुम्हें 'हिरण्यचक्रान्' सोने के चक्रवालों, 'अयोदंष्ट्रान्' लोहे के रथ वालों, 'विधा- वतः' नाना प्रकार दौड़ते हुओं 'वराहू' वराहु नाम वालों को 'पश्यन्' (स्तौति) स्तुति करता है” ॥ ४ ॥ (खं० ५) (निघ०-) स्वसराणि ॥२२॥ (निरु०) स्वमराणि अहानि भवन्ति । स्वयं सा- रीणि । अपिवा स्व-आदित्यो भवति, सः एनानि सारयति । “उस्रा इव स्वसराणि” । (ऋ० सं० १, १, ६, २) इत्यपि निगमो भवति । 'स्वसराणि' (२२) यह अनवगत है । 'स्वयंशारीणि' यह अवगम है । 'अहानि' (दिन) अर्थ कथन है । अर्थः-'स्वसर' अहन् (दिन) होते हैं। क्योंकि-वे स्वयम् (आप) सरण (गमन) करते हैं, या आपसे आप चले जाते हैं । अथवा 'स्वर' आदित्य होता है, वह इन को सारण करता (चलाता) है । “उस्रा इव स्वसराणि” अर्थात्-“'इव' जिस प्रकार 'उस्राः' रश्मियें 'स्वसराणि' (अहानि) दिनों के प्रति ( शीघ्र

हिन्दी निरुक्त (१३७) ५ अ० १ पा० ६ खं० अर्को मन्त्रो भवति यद्-अनेन अर्चन्ति । अर्कम्-अन्नं भवति, अर्चति भूतानि । अर्को वृक्षो भवति संवृतः कटुकिम्ना ॥५ (४) ॥ ‘अर्क’ (२४) यह शब्द अनेकार्थ है । अर्थ-‘अर्क’ देव होता है । क्योंकि-इसे सब पूजते हैं । ‘अर्क’ मन्त्र होता है । क्योंकि-इस से अर्चन ( पूजन ) करते हैं । ‘अर्क’ अन्न होता है । क्योंकि-वह भूतों ( प्राणियों ) को अर्चता ( पूजता ) है । ‘अर्क’ वृक्ष ( आक ) होता है, क्योंकि-वह कडुवे पन से व्याप्त होता है ॥ ५ ( ४ ) ॥ ( खं० ६ ) [निरु०] “गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः, ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ॥” ( ऋ० सं० १, १, १९, १, ) गायन्ति त्वा गायत्रिणः, प्रार्चन्ति ते अर्कम्-अर्किणो ब्राह्मणाः । त्वा शत- क्रतो ! उद्येमिरे वंशमिव । वंशः, वनशयोभवति। वननात् श्रूयते इतिवा ॥ ‘अर्क’ शब्द के देव और मन्त्र अर्थ में निगम— अर्थ- “गायन्ति त्वा०” अर्थात्-हे भगवन् ! इन्द्र ! ‘गायत्रिणः’ ( सामगाः ) साम-गान करने वाले स्तुतियों द्वारा ‘गायन्ति’ गाते हैं । ‘अर्किणः’ ( मन्त्रिणो होतारः ) मन्त्रों वाले होता लोग ‘अर्कम्’ तुझ अर्चनीय को ‘अर्चन्ति’ प्रार्चन्ति ऋचाओं द्वारा पूजते हैं । ‘ ब्रह्माणः ’ ( ब्राह्मणाः ) ये सब १८

हिन्दी निरुक्त ( १३८ ) ५ अ० १ पा० ६ खं० ब्राह्मण यज्ञ कर्म में 'शतक्रतो' हे इन्द्र ! 'त्वा' तुझे 'वंशम्-इव' बांस को जैसे 'उद्येमिरे' उठाते हैं। अर्थात् स्तुतियों और हवियों से तेरी हो महिमा को बढ़ाते हैं। इस प्रकार यहां 'अर्क' शब्द से “अर्कम्” इस पदमें देवअर्थ और “अर्किणः” पद में मन्त्र अर्थ है। 'अर्क' शब्द का वृक्ष या आक अर्थ प्रसिद्ध ही है, इस से उस का निगम नहीं दिया । [निघ०-] पविः ॥ २५ ॥ [निरु०] 'पविः' (२५) रथनेमिर्भवति । यद्विपुनाति भूमिम् । “उत पव्या रथानामद्रिं भिन्दन्त्योजसा ।” ( ऋ० सं० ४, ३, ९, ४, ) “तं मरुतः क्षुरपविनाव्ययुः” इत्यपिनिगमौ भवतः ॥ अर्थ-'पवि' ( २५ ) शब्द अनवगत है, और रथ की नेमि (पूठी या पृथ्वी में टिकने वाली पहिये की धार) का नाम है। क्योंकि-वह पृथ्वी को पवित्र करती या खोद देती है। “हे मरुतो ! 'उत' और 'रथानाम्' रथों की 'पव्या' पूठी से 'अद्रिम्' (मेघम्) मेघ को तुम 'ओजसा' बल से 'भिन्दन्ति' भेदन कर देते हो । ( पुरुष का व्यत्यय वैदिक है ) ॥” “ 'मरुतः' मरुतों ने 'तम्' उस मेघ को 'क्षुरपविना' खुरे

हिन्दी निरुक्त (१३६) ५ अ० १ पा० ६ खं० के समान पैनी पूठी से 'व्ययुः' भेदन कर दिया।" ये भी निगम हैं। (यहां रथ और भेदन क्रिया के सम्बन्ध से 'पवि' शब्द का नेमि (पूठी) अर्थ है)। (निघ०-) वक्षः ॥२६॥ [निरु०] 'वक्षो' व्याख्यातम् । अर्थ-'वक्षः' (२६) इस शब्द का “उपो अदर्शि शु- न्ध्यवः” (नि० अ० ४ पा० २ खं० ८) मन्त्र पर व्याख्यान किया जा चुका है ॥ [निघ०-] धन्व ॥२७॥ [निरु०] 'धन्व' अन्तरिक्षम् । धन्वन्ति-अस्मात् आपः । “तिरो॒धन्वा॑तिरोचते” (ऋ० सं० ८,८,४५,२) इत्यपि निगमो भवति ॥ धन्व (२७) शब्द अनवगत है। 'धन्व' (२७) क्या ? अन्तरिक्ष । क्यों ? इससे जल गिरते हैं। क्या निगम है ! “तिरो धन्वातिरोचते” अर्थात्-जो आदित्यरूप अग्नि 'तिरः' अतिविस्तार युक्त 'धन्व' आकाश देशको 'अति' अतीत्य, लांघ करके 'रोचते' हमारे प्रति प्रकाश करता है। यह भी निगम है। (यहां आदित्य की स्तुति के संबन्ध से 'धन्व' अन्तरिक्ष (आकाश) का नाम है) ॥ [निघ०-] सिनम् ॥ २८ ॥ (निरु०-) सिनम्-अन्नं भवति । सिनाति भूतानि ।

हिन्दी निरुक्त ( १४० ) ५ अ० १पा० ६ खं० “येन स्मा सिनं भरथःसखिभ्यः” (ऋ०सं०३,४,९,१) इत्यपि निगमो भवति ॥ ‘सिन’ (२८) शब्द अनवगत है । ‘सिनाति’ (बांधता है) यह शब्दयुक्ति है । ‘अन्न भवति’ (अन्न है) यह अभिधेय (अर्थ) वचन है । अर्थ- ‘ सिन ’ अन्न होता है । क्योंकि-वह सब भूतों ( प्राणियों ) को सींता ( बांधता ) है । हे इन्द्रावरुणा देवो ! ‘ येन ’ जिस माहाभाग्य ( बड़ी महिमा ) के कारण ( युवाम् ) तुम दोनों ‘ सखिभ्यः ’ समान ज्ञान वाले यजमानों के लिये ‘सिनम् ’ ( अन्नम् ) अन्न को ‘भरथः’ पूरते हो ( ‘स्म’ पाद् पूरण है ।) ॥ यह भी निगम है अन्न को ही प्राय करके यजमान मांगते हैं, इस लिए यही ‘सिन’ शब्द अन्न का ही वाचक होता है । ‘धन्व’ और ‘सिन’ इत्यादि कई शब्द अपने २ अर्थ में नैघण्टुक प्रकरण में भी पढे गए हैं,तो भी यहां (नैगमकाण्ड में) कोई अनवगत संस्कार होनेके कारण और कोई अनेकार्थ होने के कारण पढ़ेगए हैं ॥ [निघ०] इत्था ॥२६॥ (निरु०) ‘इत्था’‘अमुथा’-इत्येतेन व्याख्यातम्॥५॥ अर्थः-‘इत्था’ ( २६ ) यह निपात है । इस की व्याख्या ‘अमुथा’ ( ३, १६ ) शब्द के समान है । (निघ०-) सचा ॥ ३० ॥ [निरु०-] ‘सचा’ सह-इत्यर्थः । “वसुभिः सचा भुवा ” ( ऋ० सं०६, ३, १४, १ )

हिन्दी निरुक्त ( १४१ ) ५ अ० १ पा० ६ खं० वसुभिः सह भुवौ ॥ 'सचा' यह निपात अप्रतीतार्थ (अर्थानवगत) है। 'सचा' सह (साथ) यह अर्थ है। हे अश्विनौ ! अश्विनों ! 'वसुभिः' वसु देवताओं से 'सचा' भुवा (सहभुवौ) सहित होकर (इस सोम को पीओ, और हमारे अभिप्रेत अर्थ को सिद्ध करो ।) ॥ [निघ०-] चित् ॥ ३१ ॥ [ निरु०- ] 'चित्' इति अनुदात्तः । पुरस्तादेव व्याख्यातः । अथापि पशुनाम इह भवति उदात्तः । “ चिदसि मनासि धीरसि ” चितास्त्वयि भोगाः । चेतयसे इति वा ॥ अर्थः-'चित्' (३१) यह निपात अनुदात्त-स्वर है। पहिले (नि० अ० १ पा० २ खं० ३) व्याख्यान किया गया है। अनेकार्थ है। और उदात्त (आदि-उदात्त) होकर यहां पर [राज- ऋयणी गोकी स्तुति में- ] पशु का नाम भी होता है। हे गौः! ('त्वं') तू 'चित्' भोगसाधनी 'असि' है। 'मनासि' मान्य है। 'धीः-असि' ध्याई जाती (ध्यान की जाती) है। 'चित्' क्यों ? तुझमें सब भोग संचित हैं। अथवा तू घृत, दूध आदि के दान से मनुष्यों को चेताती है। (निघ०-) आ ॥ ३२ ॥ [निरु०-] 'आ' इति आकार उपसर्गः, पुरस्तात्-

हिन्दी निरुक्त ( १४२ ) ५ अ० १ पा० ६-७ एव व्याख्यातः । अथापि अध्यर्थे दृश्यते । “अभ्र आँ अपः । ” (ऋ० सं० ४,३,२,१) । अभ्रे आ अपोऽपोऽभ्रेऽधीति ॥ अर्थः- ‘आ’ ( ३३ ) यह उपसर्ग पहिले ही ( नि० अ० १ पा० १ खं ५ ) व्याख्यान किया जा चुका है- । ( 'आ' इति अर्वागर्थे । ) ( “अथापि उपमार्थे दृश्यते” “जार आ भगम् । ” इत्यादि । यही कदाचित् 'अधि' के अर्थ (उपरिभाव या ऐश्वर्य्य) में होता है । निगम— “ अभ्र आँ अपः ” जो ही ‘अभ्रे आ अपः’ वाक्य से कहा गया होता है, वही ‘ अपः अभ्रे अधि’ से । अर्थात् ‘अभ्रे’ मेघ के ‘आ’ ( अधि ) ऊपर ‘अपः’ जलों को ( वित- नोति ) विस्तार करती है । जल मेघ के ऊपर ही रहते हैं, इससे यहां ‘आ’ ‘अधि’के अर्थ में निश्चित होता है ॥ (निघ०-) द्युम्नम् ॥३३॥ (निरु०-) ‘द्युम्नं’ द्योततेः । यशोवा । अन्नंवा । “अस्मे द्युम्नमधिरत्नं च धेहि” [ऋ०सं०५,३,९,३) अस्मासु द्युम्नं च रत्नं च धेहि ॥ ६ (५) ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ५, १ ॥ ‘द्युम्न’ (३३) शब्द अनेकार्थ है । ‘द्योतते’ (प्रकाशता है) यह शब्द-प्रतीति है । “यशो वा” अथवा यश “अन्नंवा” अथवा अन्न यह अर्थ कथन है ।

हिन्दी निरुक्त (१४३) ५ अ० २पा० १ खं० 'द्युम्न' कैसे ? 'द्युत' (स्वा० आ०) धातु से । यह क्या ? अथवा यश है, (क्यों? 'द्योतते' वह चमकता है ।) अथवा अन्न है । (क्यों ? 'द्योतते' उसे खाने वाला प्रकाशमान होता है ।) “अस्मेद्युम्न०” हे इन्द्र ! 'अस्मे' (अस्मासु) हम में 'द्युम्नम्' यश या अन्न को 'च' और 'रत्नम्' रत्न को 'धेहि' धारण कर ॥ यहां आशीः (प्रार्थना) के सम्बन्ध से द्युम्न नाम अन्न या यश का होता है ॥ ६ (५) ॥ इति पञ्चमाध्याये प्रथमः पादः समाप्तः ॥ ५, १ ॥ :द्वितीयः पादः । (खं० १) [निघ०-] पवित्रम् ॥३४॥ तोदः ॥३५॥ (निरु०) पवित्रं पुनातेः । मन्त्रः पवित्रमुच्यते । “येन देवाः पवित्रेणात्मानं पुनते सदा ॥” (सा० सं० उ० आ० ५, २, ८, ५) इत्यपि निगमो भवति । रश्मयः पवित्रमुच्यन्ते । “गभस्तिपूतः” “गभस्तिपूतो नृभिरद्रिभिःसुतः” (ऋ० सं० ७, ३, १८, ४) इत्यपि निगमौ भवतः । आपः पवित्र मुच्यन्ते । “शतपवित्राः स्वधया मदन्तीः ॥” (ऋ०सं० ५, ४, १४, ३) । बहूदकाः ॥

हिन्दी निरुक्त ( १४४ ) ५ अ०२ पा० १ खं०

अग्निः पवित्र मुच्यते । वायुः पवित्र मुच्यते ।
सोमः पवित्रमुच्यते । सूर्य्यः पवित्रमुच्यते । इन्द्रः
पवित्रमुच्यते ।
“अग्निः पवित्रं स मा पुनातु वायुः सोमः सूर्य्य
इन्द्रः पवित्रं ते मा पुनन्तु” इत्यपि निगमो भवति ।
तोदः, तुद्यतेः ॥१ (६) ॥
‘पवित्र’ (३४) अनेकार्थ है । “पुनाते.” यह धातु का निर्देश निर्वचन के
अभिप्राय से है । क्यों कि-वह पवित्र करता है । “मन्त्र पवित्रम्-उच्यते”
(मन्त्र ‘पवित्र’ कहलाता है) इत्यादि अर्थ का कथन है ।
अर्थ-‘पवित्र’ (३४) शब्द ‘पुनाति’ (‘पूञ्’ पवने क्र्या०
प० ) धातु से है । मन्त्र ‘पवित्र’ कहा जाता है ।
“ ‘येन’ जिस ‘पवित्रेण’ पावन मन्त्र से ‘देवाः’ ऋत्विज्
और यजमान ‘सदा’ सदा ‘आत्मानम्’ अपनेको ‘पुनते’ पवित्र
करते हैं” यह भी निगम होता है । इस मन्त्र में ‘देव’ शब्द
स्तुत्यर्थक दिव् (दि० प०) धातु से ऋत्विज् और यजमान का
वाचक है, क्योंकि मुख्य देवता निष्पाप होते हैं, उनका अपने
को पवित्र करना संभव नहीं । “न च वै देवान् पापं
गच्छति” ‘देवताओं को पाप स्पर्श नहीं करता’ यह ब्राह्मण
वाक्य है ।
रश्मिएं (किरणें) पवित्र कहलाती हैं । क्योंकि-वे स्पर्श
से ही पवित्र करती हैं ।
“गभस्तिपूतः” रश्मियों (किरणों) से पवित्र हुआ हुआ ।
“गभस्तिपूतः” किरणों से पवित्र हुआ हुआ “नृभिः”

हिन्दी निरुक्त ( ०१४५ ) ५ अ० २पा० २ खं० मनुष्यों से “अद्रिभिः” पत्थरों के द्वारा “सुतः” कुटाहुआ हुआ” ये भी दो निगम होते हैं । इन मन्त्रों में किरणों की पावनता कही गई है, इससे किरण 'पवित्र' हैं । अप् ( जल ) पवित्र कहे जाते हैं । क्योंकि-वे भी पवित्र करती हैं । “ ‘ शत पवित्राः ’ ( बहूदकाः ) बहुत जलवालीं ‘ स्वधया ’ अन्न के सहित हुई हुईं ‘ मदन्ती ’ मद ( हर्ष ) देतीं हुईं ” इस मन्त्र में ‘पवित्र’ नाम जलका है । अग्नि ‘पवित्र’ कहा जाता है । वायु ‘पवित्र’ कहाजाता है । सोम ‘पवित्र’ कहा जाता है । सूर्य्य ‘पवित्र’ कहा जाता है । इन्द्र ‘ पवित्र ’ कहाजाता है । क्योंकि-ये सभी पवित्र करते हैं । “ अग्नि पवित्र है, वह मुझे पवित्र करे । वायु, सोम सूर्य्य, इन्द्रये पवित्र हैं, वे सब मुझे पवित्र करे ॥ ” यह भी निगम होता है ॥ ‘तोद्’ (३५) यह शब्द अनवगत है । 'तुद ' यह अनवगम है । 'तुद्यते' यह व्यथन (पीड़ा) अर्थ का वाचक 'तुद' (तु० उ०) धातुका निर्देश है । भूमिक्रा बिल 'तोद' कहलाता है । क्योंकि—तुन्न (खुदाहुआ) होता है । कोई 'तोद' कूप (कूए) को कहते हैं । ‘ तुद् ’ शब्द पीड़ार्थक ‘ तुद् ’ ( तु० उ० ) धातु से है ॥ १ (६) ॥ ( खं० २ ) (निघ०-) स्वञ्चाः ॥ ३६ ॥ शिपिविष्टः ॥ ३७ ॥ विष्णुः ॥ ३८ ॥ १६

हिन्दी निरुक्त ( १४६ ) ५ अ० २ पा० २ खं० (निरु०-) “पुरु त्वा दाश्वान्वोचेऽरिरमे तवस्विदा । तोदस्येव शरण आमहस्य ॥” (ऋ०सं०२,२,१९,१) ॥ बहुदाश्वांस्त्वामेव अभिह्वयामि ॥ अरिः अमित्रः । ऋच्छतेः । ईश्वरोऽपि अरिः एतस्मादेव । यदन्यदेवतया अग्नौ आहुतयो हूयन्ते इत्येतद् दृष्ट्वा एवम् अवक्ष्यत् ॥ “तोदस्येव शरण आमहस्य” तुदस्येव शरणे ऽधिमहतः । स्वञ्चाः सु अञ्चनः । “ आजुह्वानो घृतपृष्ठः स्वञ्चाः” । ( ऋ० सं० ४, २, ८, १ ) इत्यपि निगमो भवति । शिपिविष्टो विष्णुः, इति विष्णोर्द्वे नामनी भवतः । कुत्सितार्थीयं पूर्वं भवति, इति-औप- मन्यवः ॥ २ ( ७ ) ॥ अर्थः-“ 'अग्ने' हे अग्नि देव ! ' पुरु' -'दाश्वान्' बहुत देने वाला ( अहम् ) मैं 'त्वा ' तुझे ' वोचे ' ( आह्वयामि ) बुलाता हूं । क्योंकि-' स्वित् आ ' बहुत काल तक विचार पूर्वक 'तोदस्य' ( कूपस्य कूप के ' शरणे ' ( बिले ) बिलके ( अधि ) ऊपर 'इव' जैसे, अपने में अन्य अन्य देवताओं की आहुतियों के ग्रहणमें 'महस्य' ( महतः ) महान् के 'तव' तेरे ( स्तोमों के उच्चारणमें ) ' अरिः ' (समर्थः) समर्थ हूँ ॥ ” बहु दाता ( मैं ) तुझे ही बुलाता हूं । 'अरि' अमित्र ( शत्रु ) होता है । हिंसाार्थक ' ऋच्छ '

हिन्दी निरुक्त ( १४७ ) ५ अ० २ पा० २ खं० ( भ्वा० प० ) धातु से है । ईश्वर ( समर्थ ) भी 'अरि' इसी से है । जिससे कि अग्नि में अन्य अन्य देवताओं की असंख्य आहुतियाँ होती जाती हैं, ( किन्तु अग्नि की ग्रहण (दाह) शक्ति क्षीण नहीं होती) यही देखकर ऋषिने कहा होगा, कि "तोदस्येव शरणे आ महस्य" अर्थात्-जिस प्रकार किसी कूपके (शरण) छिद्रके (आ अधि) ऊपर डाले हुए पानी कहीं भी चले जाते है, उसी प्रकार हे अग्ने ! तुझ में मेरी हुई असंख्य आहुतियाँ लीन होजाती हैं, इसीसे तू (मह) महान् है, और इसीसे अन्य देवताओं को छोड़कर तुझे ही आवाहन करता हूं । "स्वञ्चाः" (३६) क्या ? 'सु अञ्चनः' सुन्दर गमन करने वाला । "आजुह्वानः" संमुख भाव से बुलाया जाता हुआ, "घृतपृष्ठः" जिसकी पीठ पर घृत है, "स्वञ्चाः" शोभन गमन करने वाला अग्नि ("भानुना सूर्यस्य यतते" अपनें तेजसे सूर्यके साथ मिलता है ।) ॥ "यह भी निगम है । यहां सूर्य के साथ मिलने के कथन से 'स्वञ्चा' शब्द 'स्वञ्चन इस शब्द प्रतीति के द्वारा गत्यर्थक 'अञ्च' ( भ्वा० प० ) धातु से है, यह उपपन्न होता है ॥ "शिपिविष्टः" (३७) "विष्णुः" (३८) ये दो विष्णु के ही नाम हैं । (इनमें 'शिपिविष्ट' शब्द गुह्य (विशेषता) नवगत है और अत से अनेकार्थ है । 'शिपिविष्ट' (शेप इव निर्वेष्टितः पुरुषचिन्ह के समान लिपटा हुआ है, यह अर्थ की प्रतीतिहै इसी शब्दके सम्बन्ध से 'विष्णु' शब्द समाम्नान किया (पढ़ा) गया है । जैसे "अक्ताः' के सम्बन्ध से "रोचः" "संमोधक्ताः)

हिन्दी निरुक्त ( १४८ ) ५ अ० २ पा० ३ खं० इन दोनों में जो पूर्व ( पहिला ) नाम ( शिपिविष्ट ) है, वह निन्दित अर्थ का वाचक है,–यह उपमन्यु का पुत्र आचार्य मानता है ॥ २ ( ७ ) ॥ ( खं० ३ ) “किमित्ते विष्णो परिचक्ष्यं भूत् प्रयदवक्षे शि- पिविष्टो अस्मि । मा वर्पो अस्मदपगूह एतद्यदन्य- रूपः समिथे बभूथ ॥” (ऋ० सं० ५, ६, २५, ६) किंते विष्णो अप्रख्यातमेतद् भवति अप्रख्या- पनीयम्, यन्नः प्रब्रूषे शेप इव निर्वेष्टितोऽस्मि इति । अप्रतिपन्नरश्मिः अपिवा प्रशंसा नामैव अभिप्रेतं स्यात् किंते विष्णो प्रख्यातमेतद् भवति प्रख्या- पनीयं, यदुत प्रब्रूषे शिपिविष्टोऽस्मि-इति प्रतिपन्न- रश्मिः । शिपयोऽत्र रश्मयः उच्यन्ते, तैः आंवि- ष्टो भवति । “मा वर्पो अस्मदपगूह एतत्” वर्ण इति रूप नाम वृणोति-इति सतः । यद्- न्यरूपः समिथे संग्रामे भवसि संयतरश्मिः । तस्यो- त्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ३ ( ८ ) ॥ ‘शिपिविष्ट’ शब्द का निन्दा अर्थ मे उदाहरण— “किमित्ते०” तेरा क्या रूप है ? इस प्रश्नके उत्तर मे ‘मै शिपिविष्ट (पुरुष चिन्ह के समान) हू ऐसा कहे जाने पर यह मन्त्र आरम्भ होता है । ‘विष्णो’ हे विष्णुदेव ! ‘किम्’ क्या ‘इत्’ (एतत्एव) यही

हिन्दी निरुक्त ( १४६ ) ५ अ० २ पा० ३ खं० 'ते' तेरा 'परिचक्ष्यम्। (प्रख्यापनीयम्) बताने योग्य (रूप) भूत् (भवति) है, (किन्तु और नहीं ?) 'यत्' जिस से 'प्र-ववक्षे' कहता है—'शिपिविष्टः अस्मि' शिपिविष्ट हूं । (क्यों कि- उदयकाल में जब तक कि-किरणों नहीं फूटती हैं, तब तक सूर्य शेप या पुरुष के चिन्ह के समान होता है । इसी से वह अप्र- ख्यात या अप्रख्यापनीय या न बताने योग्य है।) इसी से हम कहते हैं—'मा' मत 'वर्षः' यह रूप (दिखाओ ) अपितु 'अस्मत्' हमारे आगे से 'एतत्' यह रूप 'अपगूह' छिपाओ । और 'यत्' जो या जैसा कि-तू 'समिये' (संग्रामे ) संग्राम में 'अन्यरूपः' दूसरे प्रकार के रूप वाला अर्थात्-रश्मिजाल युक्त ( प्रदीप्तरूप ) 'बभूथ' होता है, वह रूप दिखा । निरुक्तार्थः-हे विष्णो ! क्या तेरा यह अप्रख्यात या अप्रख्यापनीय (नहीं प्रकट करने योग्य ) ही रूप है, जो तू हमारे सामने कहता है-शेप (लिङ्ग) के समान लिपटा हुआ हूं, यह-अप्रतिपन्नरश्मि (किरणों को नहीं प्राप्त हुआ हुआ) अथवा प्रशंसा का नाम ही समझा जा सकता है-हे विष्णो ! क्या तेरा यही प्रख्यात या प्रख्यापनीय ( बताने योग्य ) रूप है, जो तू कहता है-मैं शिपिविष्ट (प्रतिपन्नरश्मि) या बाल किरणों वाला हूं । इस पक्ष में 'शिपि' नाम से किरणें कही जाती हैं, उनसे आविष्ट या प्रवेश किया हुआ है । “मत यह रूप दिखाओ, किन्तु हमसे यह छिपाओ ।”

  • 'वर्षः' यह रूप का नाम 'वृणोति' (ढकलेता है) (वृञ् स्वा० उ०) कर्त्तृवाच्य धातु का है। जो अन्य रूपवाला तू
  • यहां 'वर्षः' शब्द का निर्वचन 'रूप' के पर्याय होने से किया गया ।

हिन्दी निरुक्त ( १५० ) ५ अ० २पा० ४ खं० संग्राम में संयतरश्मि ( किरणों के जालों से युक्त ) होता है । उसके ( प्रशंसा पक्षमें ) बहुत अधिक निर्वचन के लिये अगली ऋचा है ॥ ३ (८) ॥ ( खं० ४ ) [निघ०-] आघृणिः॥३६॥ पृथुज्रयाः ॥४०॥ (निरु०) “प्रतत्ते अद्य शिपिविष्ट नामार्यः शंसामि वयुनानि विद्वान् । तन्त्वा गृणामि तवसमत्व्या न्क्षयन्तमस्य रजसः पराके ॥” (ऋ० सं० ५, ६, २५, ५) तत्ते अद्य शिपिविष्ट ! नामार्यः प्रशंसामि, अ- र्योऽहमस्मि-ईश्वरः स्तोमानाम् । अर्य त्वमसि-इति वा । तं त्वा स्तौमि तवसम्-अतव्यान् । तवस- इति महतो नामधेयम् । उदितो भवति । निवस- न्तम्-अस्य रजसः पराके पराक्रान्ते ॥ ‘आघृणिः’ आगतहृणिः । “आघृणे संसचावहै ।” (ऋ०सं०४,८,२१,१) आगतहृणे संसेवावहै । ‘पृथुज्रयाः’ पृथुजवः । “पृथुज्रया अमिनादायुर्दस्योः”(ऋ०सं०३,३,१३,२] प्रामापयदायुर्दस्योः ॥ ४ ( ९ ) ॥ अर्थः-‘शिपिविष्ट’ ( हे विष्णो ! ) हे विष्णुदेव ! ‘अद्य’