भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 566

हिन्दी निरुक्त ( १४६ ) ५ अ० २ पा० ३ खं० 'ते' तेरा 'परिचक्ष्यम्। (प्रख्यापनीयम्) बताने योग्य (रूप) भूत् (भवति) है, (किन्तु और नहीं ?) 'यत्' जिस से 'प्र-ववक्षे' कहता है—'शिपिविष्टः अस्मि' शिपिविष्ट हूं । (क्यों कि- उदयकाल में जब तक कि-किरणों नहीं फूटती हैं, तब तक सूर्य शेप या पुरुष के चिन्ह के समान होता है । इसी से वह अप्र- ख्यात या अप्रख्यापनीय या न बताने योग्य है।) इसी से हम कहते हैं—'मा' मत 'वर्षः' यह रूप (दिखाओ ) अपितु 'अस्मत्' हमारे आगे से 'एतत्' यह रूप 'अपगूह' छिपाओ । और 'यत्' जो या जैसा कि-तू 'समिये' (संग्रामे ) संग्राम में 'अन्यरूपः' दूसरे प्रकार के रूप वाला अर्थात्-रश्मिजाल युक्त ( प्रदीप्तरूप ) 'बभूथ' होता है, वह रूप दिखा । निरुक्तार्थः-हे विष्णो ! क्या तेरा यह अप्रख्यात या अप्रख्यापनीय (नहीं प्रकट करने योग्य ) ही रूप है, जो तू हमारे सामने कहता है-शेप (लिङ्ग) के समान लिपटा हुआ हूं, यह-अप्रतिपन्नरश्मि (किरणों को नहीं प्राप्त हुआ हुआ) अथवा प्रशंसा का नाम ही समझा जा सकता है-हे विष्णो ! क्या तेरा यही प्रख्यात या प्रख्यापनीय ( बताने योग्य ) रूप है, जो तू कहता है-मैं शिपिविष्ट (प्रतिपन्नरश्मि) या बाल किरणों वाला हूं । इस पक्ष में 'शिपि' नाम से किरणें कही जाती हैं, उनसे आविष्ट या प्रवेश किया हुआ है । “मत यह रूप दिखाओ, किन्तु हमसे यह छिपाओ ।”

  • 'वर्षः' यह रूप का नाम 'वृणोति' (ढकलेता है) (वृञ् स्वा० उ०) कर्त्तृवाच्य धातु का है। जो अन्य रूपवाला तू
  • यहां 'वर्षः' शब्द का निर्वचन 'रूप' के पर्याय होने से किया गया ।