भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 565

हिन्दी निरुक्त ( १४८ ) ५ अ० २ पा० ३ खं० इन दोनों में जो पूर्व ( पहिला ) नाम ( शिपिविष्ट ) है, वह निन्दित अर्थ का वाचक है,–यह उपमन्यु का पुत्र आचार्य मानता है ॥ २ ( ७ ) ॥ ( खं० ३ ) “किमित्ते विष्णो परिचक्ष्यं भूत् प्रयदवक्षे शि- पिविष्टो अस्मि । मा वर्पो अस्मदपगूह एतद्यदन्य- रूपः समिथे बभूथ ॥” (ऋ० सं० ५, ६, २५, ६) किंते विष्णो अप्रख्यातमेतद् भवति अप्रख्या- पनीयम्, यन्नः प्रब्रूषे शेप इव निर्वेष्टितोऽस्मि इति । अप्रतिपन्नरश्मिः अपिवा प्रशंसा नामैव अभिप्रेतं स्यात् किंते विष्णो प्रख्यातमेतद् भवति प्रख्या- पनीयं, यदुत प्रब्रूषे शिपिविष्टोऽस्मि-इति प्रतिपन्न- रश्मिः । शिपयोऽत्र रश्मयः उच्यन्ते, तैः आंवि- ष्टो भवति । “मा वर्पो अस्मदपगूह एतत्” वर्ण इति रूप नाम वृणोति-इति सतः । यद्- न्यरूपः समिथे संग्रामे भवसि संयतरश्मिः । तस्यो- त्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ३ ( ८ ) ॥ ‘शिपिविष्ट’ शब्द का निन्दा अर्थ मे उदाहरण— “किमित्ते०” तेरा क्या रूप है ? इस प्रश्नके उत्तर मे ‘मै शिपिविष्ट (पुरुष चिन्ह के समान) हू ऐसा कहे जाने पर यह मन्त्र आरम्भ होता है । ‘विष्णो’ हे विष्णुदेव ! ‘किम्’ क्या ‘इत्’ (एतत्एव) यही