निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १४७ ) ५ अ० २ पा० २ खं० ( भ्वा० प० ) धातु से है । ईश्वर ( समर्थ ) भी 'अरि' इसी से है । जिससे कि अग्नि में अन्य अन्य देवताओं की असंख्य आहुतियाँ होती जाती हैं, ( किन्तु अग्नि की ग्रहण (दाह) शक्ति क्षीण नहीं होती) यही देखकर ऋषिने कहा होगा, कि "तोदस्येव शरणे आ महस्य" अर्थात्-जिस प्रकार किसी कूपके (शरण) छिद्रके (आ अधि) ऊपर डाले हुए पानी कहीं भी चले जाते है, उसी प्रकार हे अग्ने ! तुझ में मेरी हुई असंख्य आहुतियाँ लीन होजाती हैं, इसीसे तू (मह) महान् है, और इसीसे अन्य देवताओं को छोड़कर तुझे ही आवाहन करता हूं । "स्वञ्चाः" (३६) क्या ? 'सु अञ्चनः' सुन्दर गमन करने वाला । "आजुह्वानः" संमुख भाव से बुलाया जाता हुआ, "घृतपृष्ठः" जिसकी पीठ पर घृत है, "स्वञ्चाः" शोभन गमन करने वाला अग्नि ("भानुना सूर्यस्य यतते" अपनें तेजसे सूर्यके साथ मिलता है ।) ॥ "यह भी निगम है । यहां सूर्य के साथ मिलने के कथन से 'स्वञ्चा' शब्द 'स्वञ्चन इस शब्द प्रतीति के द्वारा गत्यर्थक 'अञ्च' ( भ्वा० प० ) धातु से है, यह उपपन्न होता है ॥ "शिपिविष्टः" (३७) "विष्णुः" (३८) ये दो विष्णु के ही नाम हैं । (इनमें 'शिपिविष्ट' शब्द गुह्य (विशेषता) नवगत है और अत से अनेकार्थ है । 'शिपिविष्ट' (शेप इव निर्वेष्टितः पुरुषचिन्ह के समान लिपटा हुआ है, यह अर्थ की प्रतीतिहै इसी शब्दके सम्बन्ध से 'विष्णु' शब्द समाम्नान किया (पढ़ा) गया है । जैसे "अक्ताः' के सम्बन्ध से "रोचः" "संमोधक्ताः)