भारतकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

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पृष्ठ 558

हिन्दी निरुक्त ( १४१ ) ५ अ० १ पा० ६ खं० वसुभिः सह भुवौ ॥ 'सचा' यह निपात अप्रतीतार्थ (अर्थानवगत) है। 'सचा' सह (साथ) यह अर्थ है। हे अश्विनौ ! अश्विनों ! 'वसुभिः' वसु देवताओं से 'सचा' भुवा (सहभुवौ) सहित होकर (इस सोम को पीओ, और हमारे अभिप्रेत अर्थ को सिद्ध करो ।) ॥ [निघ०-] चित् ॥ ३१ ॥ [ निरु०- ] 'चित्' इति अनुदात्तः । पुरस्तादेव व्याख्यातः । अथापि पशुनाम इह भवति उदात्तः । “ चिदसि मनासि धीरसि ” चितास्त्वयि भोगाः । चेतयसे इति वा ॥ अर्थः-'चित्' (३१) यह निपात अनुदात्त-स्वर है। पहिले (नि० अ० १ पा० २ खं० ३) व्याख्यान किया गया है। अनेकार्थ है। और उदात्त (आदि-उदात्त) होकर यहां पर [राज- ऋयणी गोकी स्तुति में- ] पशु का नाम भी होता है। हे गौः! ('त्वं') तू 'चित्' भोगसाधनी 'असि' है। 'मनासि' मान्य है। 'धीः-असि' ध्याई जाती (ध्यान की जाती) है। 'चित्' क्यों ? तुझमें सब भोग संचित हैं। अथवा तू घृत, दूध आदि के दान से मनुष्यों को चेताती है। (निघ०-) आ ॥ ३२ ॥ [निरु०-] 'आ' इति आकार उपसर्गः, पुरस्तात्-