निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १४२ ) ५ अ० १ पा० ६-७ एव व्याख्यातः । अथापि अध्यर्थे दृश्यते । “अभ्र आँ अपः । ” (ऋ० सं० ४,३,२,१) । अभ्रे आ अपोऽपोऽभ्रेऽधीति ॥ अर्थः- ‘आ’ ( ३३ ) यह उपसर्ग पहिले ही ( नि० अ० १ पा० १ खं ५ ) व्याख्यान किया जा चुका है- । ( 'आ' इति अर्वागर्थे । ) ( “अथापि उपमार्थे दृश्यते” “जार आ भगम् । ” इत्यादि । यही कदाचित् 'अधि' के अर्थ (उपरिभाव या ऐश्वर्य्य) में होता है । निगम— “ अभ्र आँ अपः ” जो ही ‘अभ्रे आ अपः’ वाक्य से कहा गया होता है, वही ‘ अपः अभ्रे अधि’ से । अर्थात् ‘अभ्रे’ मेघ के ‘आ’ ( अधि ) ऊपर ‘अपः’ जलों को ( वित- नोति ) विस्तार करती है । जल मेघ के ऊपर ही रहते हैं, इससे यहां ‘आ’ ‘अधि’के अर्थ में निश्चित होता है ॥ (निघ०-) द्युम्नम् ॥३३॥ (निरु०-) ‘द्युम्नं’ द्योततेः । यशोवा । अन्नंवा । “अस्मे द्युम्नमधिरत्नं च धेहि” [ऋ०सं०५,३,९,३) अस्मासु द्युम्नं च रत्नं च धेहि ॥ ६ (५) ॥ इति पञ्चमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ ५, १ ॥ ‘द्युम्न’ (३३) शब्द अनेकार्थ है । ‘द्योतते’ (प्रकाशता है) यह शब्द-प्रतीति है । “यशो वा” अथवा यश “अन्नंवा” अथवा अन्न यह अर्थ कथन है ।